अवमत्यास्य तद् वाक्यमाक्षिप्य च सुमध्यमा । मैवमित्यब्रवीत् कृष्णा लज्जस्वेति च सैन्धव,उसके इस प्रस्तावका तिरस्कार करके सुन्दरी द्रौपदीने उसे कड़ी फटकार सुनायी और बोली--'खबरदार, फिर कभी ऐसी बात मुखसे मत निकालना। सिन्धुराज! तुम्हें लज्जा आनी चाहिये थी
वैशम्पायन उवाच