Āraṇyaka-parva Adhyāya 199: Dharmavyādha on Svakarma, Vidhi, and the Limits of Ahiṃsā
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें शिविचरित्रविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १९७ ॥। हि मय न (0) हि २ 7 - राजाका यह कठोर नियम था कि वे सोना-चाँदीके सिवा और कुछ ब्राह्मणको नहीं देते थे, जो उनसे ये ही वस्तुएँ माँगता, उसे प्रसन्नतापूर्वक देते थे। जो दूसरी कोई चीज माँगता, उसे यह समझकर कि यह मेरा नियम भंग करना चाहता है, दण्ड देते थे। ब्राह्मण देवता दूसरेके भेजनेसे आये थे, इसलिये राजाने एक हजार अश्वोंके मूल्यसे अधिक सोना-चाँदी उन्हें दिया। अष्टनवर्त्याधेकशततमो< ध्याय: देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम् । अथाचष्ट मार्कण्डेय: । अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्चमेधे सर्वे राजान: प्रागच्छन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः प्रार्थना की--'मुने! क्षत्रिय नरेशोंके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये।” तब मार्कण्डेयजीने कहा--:धर्मराज! विश्वामित्रके पुत्र अष्टकके अश्वमेधयज्ञमें सब राजा पधारे थे
Vaiśampāyana uvāca: bhūya eva mahābhāgyaṁ kathyatām ity abravīt pāṇḍavo Mārkaṇḍeyam | athācaṣṭa Mārkaṇḍeyaḥ | aṣṭakasya vaiśvāmitrerasya aśvamedhe sarve rājānaḥ prāgacchan |
Vaiśampāyana said: Yudhiṣṭhira, the son of Pāṇḍu, again requested the sage Mārkaṇḍeya, “O greatly fortunate one, please recount once more the greatness of righteous kṣatriya kings.” Thereupon Mārkaṇḍeya began to speak: “O Dharmarāja, at the Aśvamedha sacrifice of Aṣṭaka, the son of Viśvāmitra, all the kings came and assembled.”
वैशम्पायन उवाच