Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)
अशुभै: कर्मभिश्चापि प्रायश: परिचिद्विता: । दौष्कुल्या व्याधिबहुला दुरात्मानो5प्रतापिन:,उनके शरीरमें प्रायः उनके अशुभ कर्मोंके चिह्न (कोढ़ आदि) प्रकट होने लगे। कोई अधम कुलमें जन्म लेते, कोई बहुत-से रोगोंके शिकार बने रहते और कोई दुष्ट स्वभावके हो जाते थे। उनमेंसे कोई भी प्रतापी नहीं होता था
मार्कण्डेय उवाच