Aṣṭāvakra–Kahoda Upākhyāna: Śvetaketu’s Āśrama, Sarasvatī, and the Origin of Aṣṭāvakra
राजोवाच बहुकल्याणसंयुक्तं भाषसे विहगोत्तम | सुपर्ण: पक्षिराट् किं त्वं धर्मज्ञश्नास्यसंशयम्,राजाने कहा--पक्षिश्रेष्ठ! तुम्हारी बातें अत्यन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त हैं। तुम साक्षात् पक्षिराज गरुड़ तो नहीं हो? इसमें संदेह नहीं कि तुम धर्मके ज्ञाता हो
श्येन उवाच