येषां तथा राम समारभन्न्ते कार्याणि नाथा: स्वमतेन लोके । ते नाथवन्तः पुरुषप्रवीरा नानाथवत् कृच्छुमवाप्लुवन्ति,बलरामजी! जगतमें जिनके कार्य उनके सहायक अपने ही विचारसे प्रारम्भ करते हैं, वे पुरुषश्रेष्ठ सनाथ माने जाते हैं। वे अनाथकी भाँति कभी कष्टमें नहीं पड़ते
बलदेव उवाच