Svargārohaṇa-parva Adhyāya 2 — Yudhiṣṭhira’s Inquiry for His Kin and the Vision of a Punitive Realm
युधिष्ठिरस्तु निर्विण्णस्तेन गन्धेन मूर्च्छित: । निवर्तने धृतमना: पर्यावर्तत भारत,भरतनन्दन! युधिष्ठिर वहाँकी दुर्गन्न्धसे घबरा गये थे। उन्हें मूर्च्छा-सी आने लगी थी। इसलिये उन्होंने मनमें लौट जानेका ही निश्चय किया और उस निश्चयके अनुसार वे लौट पड़े
वैशम्पायन उवाच