न दुःखेषूचिता: पूर्व दुःखं गाहन्त्यनिन्दिता: । भ्रातृभि: पतिशि: पुत्रैरुपाकीर्णा वसुंधरा,'ये सती साध्वी सुन्दरी स्त्रियाँ पहले कभी ऐसे दुःखमें नहीं पड़ी थीं; किंतु आज दुःखके समुद्रमें डूब रही हैं। यह सारी पृथ्वी इनके भाइयों, पतियों और पुत्रोंसे ढेंक गयी है
वैशम्पायन उवाच