धर्मराजं परिष्वज्य सान्त्वयित्वा च भारत | दुष्टात्मा भीममन्वैच्छद् दिधक्षुरिव पावक:,भरतनन्दन! धर्मराजको हृदयसे लगाकर उन्हें सान्त्वना दे धृतराष्ट्र भीमको इस प्रकार खोजने लगे, मानो आग बनकर उन्हें जला डालना चाहते हों। उस समय उनके मनमें दुर्भावना जाग उठी थी
वैशम्पायन उवाच