स्त्रीपर्व १: धृतराष्ट्रशोकः संजयाश्वासनं च
Strī Parva 1: Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Saṃjaya’s Consolation
पुत्रगृद्धया त्वया राजन् प्रियं तस्य चिकीर्षितम् । पश्चात्तापमिमं प्राप्तो न त्वं शोचितुमरहसि,“राजन! आपने पुत्रके प्रति आसक्ति रखनेके कारण सदा उसीका प्रिय करना चाहा, इसीलिये इस समय आपको यह पश्चात्तापका अवसर प्राप्त हुआ है; अत: अब आप शोक न करें
वैशमग्पायन उवाच