स्त्रीपर्व १: धृतराष्ट्रशोकः संजयाश्वासनं च
Strī Parva 1: Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Saṃjaya’s Consolation
सुहन्मित्रविनाश श्व दैवयोगादुपागत: । को<न्यो<$स्ति दुःखिततरो मत्तो5न्यो हि पुमान् भुवि,अब मेरा बुढ़ापा आ गया, सारे बन्धु-बान्धवोंका विनाश हो गया और दैववश मेरे सुहृदों तथा मित्रोंका भी अन्त हो गया। भला, इस भूमण्डलमें अब मुझसे बढ़कर महान् दुःखी दूसरा कौन होगा?
धृतराष्ट उवाच