अध्याय ४ — दुर्योधनस्य असंधि-निश्चयः
Duryodhana’s Refusal of Reconciliation
आयोधन चातिघोरें रुद्रस्याक्रीड संनिभम् । अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रश:,संजय कहते हैं--माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दु:खमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा--
sañjaya uvāca |
āyodhanaṃ cātighore rudrasyākrīḍa-sannibham |
aprakhyātiṃ gatānāṃ tu rājñāṃ śata-sahasraśaḥ ||
Sañjaya said: “O King, that battlefield had become exceedingly dreadful, like a playground of Rudra (Śiva) in his fierce aspect. There, in their hundreds of thousands, kings were reduced to obscurity—their fame and very trace erased amid the ruin of war.”
संजय उवाच