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Shloka 37

Adhyāya 3: Indra’s Invitation and Yudhiṣṭhira’s Refusal to Abandon the Dog

Svargārohaṇa Test

तैर्विना नोत्सहे वस्तुमिह दैत्यनिबर्हण । गन्तुमिच्छामि तत्राहं यत्र ते भ्रातरो गता:,'दैत्यसूदन! अपने भाइयोंके बिना मुझे यहाँ रहनेका उत्साह नहीं होता; अतः मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कदवाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियोंमें श्रेष्ठ मेरी द्रौपदी गयी है

वैशम्पायन उवाच