यथा हि समरे द्रोण: पार्षतं वीक्ष्य मारिष,आर्य! जैसे द्रोणाचार्य समरभूमिमें धृष्टद्युम्मको देखकर मन-ही-मन खिन्न हो उसे अपनी मृत्यु मानते थे, उसी प्रकार शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले धृष्टद्युम्न भी रफक्षेत्रमें अश्वत्थामाको देखकर अप्रसन्न हो उसे अपनी मृत्यु समझते थे
संजय उवाच