चामरैश्वन्द्ररश्म्या भै्हेमदण्डै: सुशो भनै: । दोधूयमानै: शुशुभे विद्युद्धिरिव तोयद:,चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत तथा सुवर्णमय दण्डवाले सुन्दर शोभाशाली अनेक चँवर डुलाये जा रहे थे। उनसे राजा युधिष्ठिरकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे बिजलियोंसे मेघ सुशोभित होता है
संजय उवाच