अन्तरिक्षे च भूतानि प्राक्रोशन्त विशाम्पते । दृष्टवा निपतितं वीरं च्युतं चन्द्रमिवाम्बरात्,महाराज! उस समय अन्तरिक्षमें खड़े हुए प्राणी आकाशसे गिरे हुए चन्द्रमाके समान वीर अभिमन्युको रणभूमिमें पड़ा देख उच्च स्वरसे आपके महारथियोंकी निन्दा करने लगे
संजय उवाच