नील (0) आप +औअस+- + तलवारको मण्डलाकार घुमाना 'भ्रान्त' कहलाता है। वही कार्य बाँह ऊपर उठाकर किया जाय तो उसे 'उदश्रान्त' कहा गया है। अपने चारों ओर तलवारको घुमाया जाय तो उसे “आविद्ध' कहते हैं। ये तीन कार्य शत्रुके चलाये हुए शस्त्रका निवारण करनेके लिये किये जाते हैं, शत्रुपर आक्रमण करनेके लिये जाना “आप्लुत” माना गया है। तलवारकी नोकसे शत्रुके शरीरका स्पर्श करना 'प्रसृत” कहा गया है। चकमा देकर शत्रुपर शस्त्रका आघात करना 'सृत” बताया गया है। शत्रुके दायें-बायें तलवार चलाना “परिवृत्त” कहा गया है। पीछे हटना “निवृत्त” है। दोनों योद्धाओंका परस्पर आघात- प्रत्याघात 'सम्पात” कहलाता है। अपनी विशेषता स्थापित करना '“समुदीर्ण” है। अंग-प्रत्यंगमें तलवार भाँजना “भारत' माना गया है। विचित्र रीतिसे तलवार चलानेकी कला दिखाना “कौशिक' कहा गया है। अपनेको ढालकी आड़में छिपाकर तलवार चलानेका नाम 'सात्वत' है। द्विनवत्याधेकशततमो< ध्याय: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर सुद्ध धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद संजय उवाच सात्वतस्य तु तत् कर्म दृष्टवा दुर्योधनादय: । शैनेयं सर्वतः क्रुद्धा वारयामासुरञण्जसा,संजय कहते हैं--राजन्! सात्वतवंशी सात्यकिका वह कर्म देखकर दुर्योधन आदि कौरवयोद्धा कुपित हो उठे और उन्होंने अनायास ही शिनिपौत्रको सब ओरसे घेर लिया
sañjaya uvāca | sātvatasyā tu tat karma dṛṣṭvā duryodhanādayaḥ | śaineyaṃ sarvataḥ kruddhā vārayāmāsur añjasā ||
Sanjaya said: “O King, seeing that deed of Sātvata (Sātyaki), Duryodhana and the other Kaurava warriors flared up in anger and, without difficulty, checked the son of Śini (Sātyaki), surrounding him on all sides.”
संजय उवाच