(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४८ “लोक हैं।) भीकम (2 अमान अष्टस प्तरत्याधेकशततमो< ध्याय: दोनों सेनाओंमें परस्पर घोर युद्ध और घटोत्कचके द्वारा अलायुधका वध एवं दुर्योधनका पश्चात्ताप संजय उवाच संदृश्य समरे भीम॑ रक्षसा ग्रस्तमन्तिकात् । वासुदेवो<ब्रवीद् राजन् घटोत्कचमिदं वच:,संजय कहते हैं--राजन्! समरभूमिमें राक्षसके चंगुलमें फँसे हुए भीमसेनको निकटसे देखकर भगवान् श्रीकृष्णने घटोत्कचसे यह बात कही-- इस प्रकार श्रीमह्माभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय अलायुधका वधविषयक एक सौ अठठ्ठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७८ ॥/ ऑपनआ प्रा छा अ-काज जा एकोनाशीरत्याधेकशततमो< ध्याय: घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध संजय उवाच निहत्यालायुध॑ रक्ष: प्रह्ष्टात्मा घटोत्कच: । ननाद विविधान् नादान् वाहिन्या: प्रमुखे तव
sañjaya uvāca
nihatyālāyudhaṁ rakṣaḥ prahṛṣṭātmā ghaṭotkacaḥ |
nanāda vividhān nādān vāhinyāḥ pramukhe tava ||
Sanjaya said: After slaying the rākṣasa Ālāyudha, Ghaṭotkaca—his spirit exultant—roared out many kinds of battle-cries at the very front of your army. The moment marks a surge of confidence and terror on the night battlefield, where prowess and morale become decisive forces amid the ethical tragedy of fratricidal war.
संजय उवाच