तेन विद्राव्यमाणानि पाण्डुसैन्यानि भारत । निशीथे विप्रकीर्यन्ते वातनुन्ना घना इव,अभियाति द्रुतं कर्ण तद् वारय महारथम् । संजय कहते हैं--राजन! युद्धस्थलमें इस प्रकार कर्णका वध करनेकी इच्छासे उद्यत हुए घटोत्कचको सूतपुत्रके रथकी ओर आते देख आपके पुत्र दुर्योधनने दःशासनसे इस प्रकार कहा--'भाई! यह राक्षस रणभूमिमें कर्णका वेगपूर्वक पराक्रम देखकर तीव्र गतिसे उसपर आक्रमण कर रहा है; अतः उस महारथी घटोत्कचको रोको भारत! उसके खदेड़े हुए पाण्डवसैनिक हवाके उड़ाये हुए बादलोंके समान उस निशीथकालमें चारों ओर बिखर गये
tena vidrāvyamāṇāni pāṇḍusainyāni bhārata | niśīthe viprakīryante vātanunnā ghanā iva || abhiyāti drutaṃ karṇa tad vārayā mahāratham ||
Sañjaya said: “O Bhārata (Dhṛtarāṣṭra), as the Pāṇḍava forces were being routed by him, they scattered in the midnight darkness like clouds driven apart by the wind. ‘Karna—he is rushing swiftly (toward you); therefore, restrain that great chariot-warrior!’”
संजय उवाच