Adhyāya 16: Saṃśaptaka-vrata and the Diversion of Arjuna (द्रोणपर्व, अध्याय १६)
(भारद्वाजममर्षश्न विक्रमश्न समाविशत् । समुद्धृत्य निषड्भाच्च धनुर्ज्यामवमृज्य च ।। महाशरघधनुष्पाणिर्यन्तारमिदमब्रवीत् । उस समय द्रोणाचार्यमें अमर्ष और पराक्रम दोनोंका समावेश हुआ। उन्होंने धनुषकी प्रत्यंचाको पोंछकर तूृणीरसे बाण निकाला और उस महान् बाण एवं धनुषको हाथमें लेकर सारथिसे इस प्रकार कहा। द्रोण उदाच सारथे याहि यत्रैव पाण्डरेण विराजता ।। टप्रियमाणेन छत्रेण राजा तिष्ठति धर्मराट् । द्रोणाचार्य बोले--सारथे! वहीं चलो, जहाँ सुन्दर श्वेत छत्र धारण किये धर्मराज राजा युधिष्ठिर खड़े हैं। तदेतद् दीर्यते सैन्यं धार्तराष्ट्रमनेकथा ।। एतत् संस्तम्भयिष्यामि प्रतिवार्य युधिष्ठिरम् । यह धुृतराष्ट्रकी सेना तितर-बितर हो अनेक भागोंमें बँटी जा रही हैं। मैं युधिष्ठिरको रोककर इस सेनाको स्थिर करूँगा (भागनेसे रोकूँगा)। न हि मामभिवर्षन्ति संयुगे तात पाण्डवा: ।। मात्स्या: पाड्चालराजान: सर्वे च सहसोमका: । तात! ये पाण्डव, मत्स्य, पांचाल और समस्त सोमक वीर मुझपर बाण-वर्षा नहीं कर सकते। अर्जुनो मत्प्रसादाद्धि महास्त्राणि समाप्तवान् ।। न मामुत्सहते तात न भीमो न च सात्यकि: । अर्जुनने भी मेरी ही कृपासे बड़े-बड़े अस्त्रोंको प्राप्त किया है। तात! वे भीमसेन और सात्यकि भी मुझसे लड़नेका साहस नहीं कर सकते। मत्प्रसादाद्धि बीभत्सु: परमेष्वासतां गतः ।। ममैवास्त्रं विजानाति धृष्टद्युम्नोडपि पार्षत: । अर्जुन मेरे ही प्रसादसे महान् धनुर्धर हो गये हैं। धृष्टद्युम्न भी मेरे ही दिये हुए अस्त्रोंका ज्ञान रखता है। नायं संरक्षितुं काल: प्राणांस्तात जयैषिणा ।। याहि स्वर्ग पुरस्कृत्य यशसे च जयाय च । तात सारथे। विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वीरके लिये यह प्राणोंकी रक्षा करनेका अवसर नहीं है। तुम स्वर्गप्राप्तिका उद्देश्य लेकर यश और विजयके लिये आगे बढ़ो। संजय उवाच एवं संचोदितो यन्ता द्रोणम भ्यवहत् ततः ।। तदाश्वह्वदयेनाश्चवानभिमन्त्रयाशु हर्षयन् । रथेन सवरूथेन भास्वरेण विराजता ।। संजय कहते हैं--राजन्! इस प्रकार प्रेरित होकर सारथि अश्वह्ृदय नामक मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके घोड़ोंका हर्ष बढ़ाता हुआ आवरणयुक्त प्रकाशमान एवं तेजस्वी रथके द्वारा शीघ्रतापूर्वक द्रोणाचार्यको आगे ले चला। त॑ करूषाश्न मत्स्याश्ष चेदयश्षु ससात्वता: । पाण्डवाश्न सपञ्चाला: सहिता: पर्यवारयन् ।।) उस समय करूष, मत्स्य, चेदि, सात्वत, पाण्डव तथा पांचाल वीरोंने एक साथ आकर द्रोणाचार्यको रोका। ततः शोणहय: क्रुदधश्वतुर्दन्त इव द्विप: । प्रविश्य पाण्डवानीकं युधिष्िरमुपाद्रवत्,तब लाल घोड़ोंवाले द्रोणाचार्यने कुपित हो चार दाँतोंवाले गजराजके समान पाण्डव- सेनामें घुसकर युधिष्ठिरपर आक्रमण किया
sañjaya uvāca |
tataḥ śoṇahayaḥ kruddhaś caturdanta iva dvipaḥ |
praviśya pāṇḍavānīkaṁ yudhiṣṭhiram upādravat ||
Sañjaya said: Then Droṇa, whose chariot was drawn by red horses, enraged and like a four-tusked lordly elephant, broke into the Pāṇḍava battle-array and charged straight at Yudhiṣṭhira. The scene underscores how wrath and martial resolve can drive a commander to pierce formations and seek the opposing king, making the struggle not merely of arms but of leadership, morale, and dharma under pressure.
संजय उवाच