अध्याय १४६ — निशायां सात्यकिदुर्योधनयुद्धम् / Chapter 146 — Night Battle: Sātyaki and Duryodhana; Śakuni’s Encirclement of Arjuna
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका प्रशंसाविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १४४ ॥/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ ३ “लोक मिलाकर कुल ३२३ श्लोक हैं।) निज जा | मु । #* पञ्चचत्वारिशदाधिकशततमो< ध्याय: अर्जुनका जयद्रथपर आक्रमण, कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत, कर्णके साथ अर्जुनका युद्ध और कर्णकी पराजय तथा सब योद्धाओंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध धृतराष्ट्र रवाच तदवस्थे हते तस्मिन् भूरिश्रवसि कौरवे । यथा भूयो5भवद् युद्ध तन्ममाचक्ष्व संजय,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जो वीर सात्यकि द्रोण, कर्ण, विकर्ण और कृतवर्मासे भी परास्त न हुए और युधिष्छिरसे की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार कौरव-सेनारूपी समुद्रसे पार हो गये, जिन्हें समरांगणमें कोई भी रोक न सका, उन्हींको कुरुवंशी भूरिश्रवाने बलपूर्वक पकड़कर कैसे पृथ्वीपर गिरा दिया?
Dhṛtarāṣṭra uvāca | tad-avasthē hatē tasmin bhūriśravasi kauravē | yathā bhūyo 'bhavad yuddhaṁ tan mamācakṣva sañjaya ||
Dhṛtarāṣṭra said: “Sañjaya, when that Kaurava Bhūriśravas had been slain in such a condition, tell me how the battle unfolded again thereafter.”
धृतराष्ट उवाच