युधिष्ठिरस्य कृष्णार्जुनादि-समाश्वासनम्
Yudhiṣṭhira’s reassurance and praise of Kṛṣṇa, Arjuna, Bhīma, and Sātyaki
कोडन्य: स्थास्यति संग्रामे भीतो भीते व्यपाश्रये । 'परंतु तुम आज युद्ध छोड़कर भयभीत हो उठे और शत्रुओंका हर्ष बढ़ा रहे हो। शत्रुसूदन! तुम तो सेनापति हो। तुम्हारे भागनेपर दूसरा कौन युद्धभूमिमें ठहर सकेगा? जब आश्रयदाता या रक्षक ही डर जाय, तब दूसरा क्यों न भयभीत होगा?
संजय उवाच