रुक्मपुड्खैश्न दुष्प्रेक्ष्यै: कार्मुकैः पृथिवीपते । कूजद्धिरतुलान् नादान् कोपितैस्तुरगैरिव,पृथ्वीपते! वे सोनेके पंखवाले दुर्लक्ष्य बाणों और क्रोधमें भरे हुए घोड़ोंके समान अनुपम टंकारथध्वनि करनेवाले धनुषोंके द्वारा भी समस्त दिशाओंमें दीप्ति बिखेर रहे थे
संजय उवाच