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Shloka 1

Adhyāya 41 — Yudhiṣṭhira’s Gurv-anumati and Strategic Counsel (युधिष्ठिरस्य गुर्वनुमतिः)

५)। इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये भगवानने गीताके चौदहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें सत्त्व, रज और तम--इस प्रकार तीनों गुणोंका नाम देकर तीनोंको प्रकृतिसम्भव बतलाया है। २. यहाँ “प्रकृति” शब्द ईश्वरकी अनादिसिद्ध मूल प्रकृतिका वाचक है। गीताके चौदहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें इसीको महदब्रह्मके नामसे कहा गया है। सातवें अध्यायके चौथे और पाँचवें श्लोकोंमें अपरा प्रकृतिके नामसे और इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें क्षेत्रके नामसे भी इसीका वर्णन है। भेद इतना ही है कि वहाँ सातवें अध्यायमें उसके कार्य-- मन, बुद्धि, अहंकार और पंचमहाभूतादिके सहित प्रकृतिका वर्णन है और यहाँ केवल “मूल प्रकृति" का वर्णन है। ३. जीवका जीवत्व अर्थात्‌ प्रकृतिके साथ उसका सम्बन्ध किसी हेतुसे होनेवाला--आगन्तुक नहीं है, यह अनादिसिद्ध है और इसी प्रकार ईश्वरकी शक्ति यह प्रकृति भी अनादिसिद्ध है--ऐसा समझना चाहिये। ४. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी--ये पाँचों सूक्ष्म महाभूत तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँचों इन्द्रियोंके विषय; इन दसोंका वाचक यहाँ “कार्य” शब्द है। बुद्धि, अहंकार और मन--ये तीनों अन्तःकरण; श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण--ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ एवं वाकू, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा--ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ; इन तेरहका वाचक यहाँ “करण” शब्द है। ये तेईस तत्त्व प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृति ही इनका उपादान कारण है; क्योंकि प्रकृतिसे महत्तत्त्व, महत्तत््व्से अहंकार, अहंकारसे पाँच सूक्ष्म महाभूत, मन और दस इन्द्रिय तथा पाँच सूक्ष्म महाभूतोंसे पाँचों इन्द्रियोंके शब्दादि पाँचों स्थूल विषयोंकी उत्पत्ति मानी जाती है। सांख्यकारिकामें भी कहा है-- प्रकृतेर्महांस्ततो5हड्कारस्तस्माद्‌ गणश्व॒ षोडशक: । तस्मादपि षोडशकात्‌ पञ्चभ्य: पञ्च भूतानि ।। (सांख्यकारिका २२) “प्रकृतिसे महत्तत्त्व (समष्टिबुद्धि)-की यानी बुद्धितत््वकी, उससे अहंकारकी और अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ, एक मन और दस इन्द्रियाँ--इन सोलहके समुदायकी उत्पत्ति हुई तथा उन सोलहमेंसे पाँच तन्मात्राओंसे पाँच स्थूल भूतोंकी उत्पत्ति हुई।' गीताके वर्णनमें पाँच तन्मात्राओंकी जगह पाँच सूक्ष्म महाभूतोंका नाम आया है और पाँच स्थूल भूतोंके स्थानमें पाँच इन्द्रियोंक विषयोंका नाम आया है, इतना ही भेद है। ५. प्रकृति जड है, उसमें भोक्तापनकी सम्भावना नहीं है और पुरुष असंग है, इसलिये उसमें भी वास्तवमें भोक्तापन नहीं है। प्रकृतिके संगसे ही पुरुषमें भोक्तापनकी प्रतीति-सी होती है और यह प्रकृति-पुरुषका रंग अनादि है, इसलिये यहाँ पुरुषको सुख-दु:खोंके भोक्तापनमें हेतु यानी निमित्त माना गया है। ३. प्रकृतिसे बने हुए स्थूल, सूक्ष्म और कारण--इन तीनों शरीरोंमेंसे किसी भी शरीरके साथ जबतक इस जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह प्रकृतिमें स्थित (प्रकृतिस्थ) कहलाता है, अतएव जबतक आत्माका प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है, तभीतक वह प्रकृतिजनित गुणोंका भोक्ता है। २. मनुष्यसे लेकर उससे ऊँची जितनी भी देवादि योनियाँ हैं, सब सत्‌-योनियाँ हैं और मनुष्यसे नीची जितनी भी पशु, पक्षी, वृक्ष और लता आदि योनियाँ हैं, वे असत्‌ हैं। सत्तव, रज और तम--इन तीनों गुणोंके साथ जो जीवका अनादिसिद्ध सम्बन्ध है एवं उनके कार्यरूप सांसारिक पदार्थोंमें जो आसक्ति है, वही गुणोंका संग है; जिस मनुष्यकी जिस गुणमें या उसके कार्यरूप पदार्थमें आसक्ति होगी, उसकी वैसी ही वासना होगी, वासनाके अनुसार ही अन्तकालनमें स्मृति होगी और उसीके अनुसार उसे पुनर्जन्म प्राप्त होगा। इसीलिये यहाँ अच्छी-बुरी योनियोंकी प्राप्तिमें गुणोंक संगको कारण बतलाया गया है। ३. प्रकृतिजनित शरीरोंकी उपाधिसे जो चेतन आत्मा अज्ञानके कारण जीवभावको प्राप्त-सा प्रतीत होता है, वह क्षेत्रज्ञ वास्तवमें इस प्रकृतिसे सर्वधा अतीत परमात्मा ही है; क्योंकि उस परब्रह्म परमात्मामें और क्षेत्रज्ञमें वस्तुत: किसी प्रकारका भेद नहीं है, केवल शरीररूप उपाधिसे ही भेदकी प्रतीति हो रही है। ४. इस कथनसे इस बातका प्रतिपादन किया गया है कि भिन्न-भिन्न निमित्तोंसे एक ही परब्रह्म परमात्मा भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारा जाता है। वस्तुदृष्टिसे ब्रह्ममें किसी प्रकारका भेद नहीं है। ५. जितने भी पृथक्‌-पृथक्‌ क्षेत्रज्ञोंकी प्रतीति होती है, सब उस एक परब्रह्म परमात्माके ही अभिन्न स्वरूप हैं; प्रकृतिके संगसे उनमें भिन्नता-सी प्रतीत होती है, वस्तुत: कोई भेद नहीं है और वह परमात्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और अविनाशी तथा प्रकृतिसे सर्वधा अतीत है--इस बातको संशयरहित यथार्थ समझ लेना एवं एकीभावसे उस सच्चिदानन्दघनमें नित्य स्थित हो जाना ही 'पुरुषको तत्त्वसे जानना” है। तीनों गुण प्रकृतिसे उत्पन्न हैं, यह समस्त विश्व प्रकृतिका ही पसारा है और वह नाशवान्‌, जड, क्षणभंगुर और अनित्य है--इस रहस्यको समझ लेना ही “गुणोंके सहित प्रकृतिको तत्त्वसे जानना है। ६. वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र--किसी भी वर्णमें एवं ब्रह्मबचर्यादे किसी भी आश्रममें रहता हुआ तथा उन-उन वर्णाश्रमोंके लिये शास्त्रमें विधान किये हुए समस्त कर्मोंको यथायोग्य करता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। यहाँ *सर्वथा वर्तमान:” का अर्थ निषिद्ध कर्म करता हुआ नहीं समझना चाहिये; क्योंकि आत्मतत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीमें काम-क्रोधादि दोषोंका सर्वथधा अभाव हो जानेके कारण (गीता ५।२६) उसके द्वारा निषिद्ध कर्मका बनना सम्भव नहीं है। इसीलिये उसके आचरण संसारमें प्रमाणरूप माने जाते हैं (गीता ३।२१)। पापोंमें मनुष्यकी प्रवृत्ति काम-क्रोधादि अवगुणोंके कारण ही होती है; अर्जुनके पूछनेपर भगवानने तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें इस बातको स्पष्टरूपसे कह भी दिया है। ७. प्रकृति और पुरुषके तत्त्वको जान लेनेके साथ ही पुरुषका प्रकृतिसे सम्बन्ध टूट जाता है; क्योंकि प्रकृति और पुरुषका संयोग स्वप्नवत्‌ू, अवास्तविक और केवल अज्ञानजनित माना गया है। जबतक प्रकृति और पुरुषका पूर्ण ज्ञान नहीं होता, तभीतक पुरुषका प्रकृतिसे और उसके गुणोंसे सम्बन्ध रहता है और तभीतक उसका बार-बार नाना योनियोंमें जन्म होता है (गीता १३।२१)। अतएव इनका तत्त्व जान लेनेके बाद पुनर्जन्म नहीं होता। ३. गीताके छठे अध्यायके ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकोंमें बतलायी हुई विधिके अनुसार शुद्ध और एकान्त स्थानमें उपयुक्त आसनपर निश्चलभावसे बैठकर इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर, मनको वशमें करके तथा एक परमात्माके सिवा दृश्यमात्रको भूलकर निरन्तर परमात्माका चिन्तन करना ध्यान है। इस प्रकार ध्यान करते रहनेसे बुद्धि शुद्ध हो जाती है और उस विशुद्ध सूक्ष्मबुद्धिसे जो हृदयमें सच्चिदानन्द्घन परत्रह्म परमात्माका साक्षात्कार किया जाता है, वही ध्यानद्वारा आत्मासे आत्मामें आत्माको देखना है। परंतु भेदभावसे सगुण-निराकारका और सगुण-साकारका ध्यान करनेवाले साधक भी यदि इस प्रकारका फल चाहते हों तो उनको भी अभेदभावसे निर्मुण-निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मकी प्राप्ति हो सकती है। २. सम्पूर्ण पदार्थ मृगतृष्णाके जल अथवा स्वप्नकी सृष्टिके सदृश मायामात्र हैं; इसलिये प्रकृतिके कार्यरूप समस्त गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं--ऐसा समझकर मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा होनेवाले समस्त कर्मोमें कर्तापनके अभिमानसे रहित हो जाना तथा सर्वव्यापी सच्चिदानन्द्घन परमात्मामें एकीभावसे नित्य स्थित रहते हुए एक सच्चिदानन्द्घन परमात्माके सिवा अन्य किसीकी भी भिन्न सत्ता न समझना--यह '“सांख्ययोग” नामक साधन है और इसके द्वारा जो आत्मा और परमात्माके अभेदका प्रत्यक्ष होकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका अभिन्नभावसे प्राप्त हो जाना है, वही सांख्ययोगके द्वारा आत्माको आत्मामें देखना है। यह साधन साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारीके द्वारा ही सुगमतासे किया जा सकता है। इसका विस्तार “गीतातत्त्व- विवेचनी'” में देखना चाहिये। ३. जिस साधनका गीताके दूसरे अध्यायमें चालीसवें श्लोकसे उक्त अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त फलसहित वर्णन किया गया है, उसका वाचक यहाँ “कर्मयोग'” है। अर्थात्‌ आसक्ति और कर्मफलका सर्वथा त्याग करके सिद्धि और असिद्धिमें समत्व रखते हुए शास्त्रानुसार निष्कामभावसे अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार सब प्रकारके विहित कर्मोंका अनुष्ठान करना कर्मयोग है और इसके द्वारा जो सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको अभिन्नभावसे प्राप्त हो जाना है, वही कर्मयोगके द्वारा आत्मामें आत्माको देखना है। ४. बुद्धिकी मन्दताके कारण जो लोग पूर्वोक्त ध्यानयोग, सांख्ययोग और कर्मयोग--इनमेंसे किसी भी साधनको भलीभाँति नहीं समझ पाते, ऐसे साधकोंका वाचक यहाँ “एवम्‌ अजानन्तः” विशेषणके सहित “अन्ये” पद है। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंका आदेश प्राप्त करके अत्यन्त श्रद्धा और प्रेमके साथ जो जबालाके पुत्र सत्यकामकी भाँति उसके अनुसार आचरण करना है, वही दूसरोंसे सुनकर उपासना करना है। ५. तेईसवें श्लोकमें जो बात “न स भूयोडभिजायते' से और चौबीसवेंमें जो बात “आत्मनि आत्मानं पश्यन्ति” से कही है, वही बात यहाँ *मृत्युम्‌ अतितरन्ति” से कही गयी है। ३. इस अध्यायके पाँचवें श्लोकमें जिन चौबीस तत्त्वोंके समुदायको क्षेत्रका स्वरूप बतलाया गया है, गीताके सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें जिसको “अपरा प्रकृति” कहा गया है, वही “क्षेत्र” है और उसको जो जाननेवाला है, जिसको गीताके सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें “परा प्रकृति” कहा गया है, वह चेतनतत्त्व ही 'क्षेत्रज्ञ' है, उसका यानी 'प्रकृतिस्थ” पुरुषका जो प्रकृतिसे बने हुए भिन्न-भिन्न सूक्ष्म और स्थूल शरीरोंके साथ सम्बन्ध होना है, वही क्षेत्र तथा क्षेत्रञ॒का संयोग है और इसके होते ही जो भिन्न-भिन्न योनियोंद्वारा भिन्न-भिन्न आकृतियोंमें प्राणियोंका प्रकट होना है, वही उनका उत्पन्न होना है। २. यहाँ 'परमेश्वर' शब्द प्रकृतिसे सर्वया अतीत उस निर्विकार चेतनतत्त्वका वाचक है, जिसका वर्णन 'क्षेत्रज्' के साथ एकता करते हुए इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्माके नामसे किया गया है। समस्त प्राणियोंके जितने भी शरीर हैं, जिनके सम्बन्धसे वे विनाशशील कहे जाते हैं, उन समस्त शरीरोंमें उनके वास्तविक स्वरूपभूत एक ही अविनाशी निर्विकार चेतनतत्त्व परमात्माको जो विनाशशील बादलोंमें आकाशकी भाँति समभावसे स्थित और नित्य देखना है--वही उस “परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें विनाशरहित और समभावसे स्थित देखना है। 3. एक ही सच्चिदानन्दघन परमात्मा सर्वत्र समभावसे स्थित है, अज्ञानके कारण ही भिन्न-भिन्न शरीरोंमें उसकी भिन्नता प्रतीत होती है--वस्तुतः उसमें किसी प्रकारका भेद नहीं है--इस तत्त्वको भलीभाँति समझकर प्रत्यक्ष कर लेना ही 'सर्वत्र समभावसे स्थित परमेश्वरको सम देखना” है। जो इस तत्त्वको नहीं जानते, उनका देखना सम देखना नहीं है; क्योंकि उनकी सबमें विषमबुद्धि होती है, वे किसीको अपना प्रिय, हितैषी और किसीको अप्रिय तथा अहित करनेवाला समझते हैं एवं अपने-आपको दूसरोंसे भिन्न, एकदेशीय मानते हैं। अतएव वे शरीरोंके जन्म और मरणको अपना जन्म और मरण माननेके कारण बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर मरते रहते हैं, यही उनका अपनेद्वारा अपनेको नष्ट करना है; परंतु जो पुरुष उपर्युक्त प्रकारसे एक ही परमेश्वरको समभावसे स्थित देखता है, वह न तो अपनेको उस परमेश्वरसे भिन्न समझता है और न इन शरीरोंसे अपना कोई सम्बन्ध ही मानता है। इसलिये वह शरीरोंके विनाशसे अपना विनाश नहीं देखता और इसीलिये वह अपनेद्वारा अपनेको नष्ट नहीं करता। अभिप्राय यह है कि उसकी स्थिति सर्वज्ञ, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मामें अभिन्नभावसे हो जाती है, अतएव वह सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है। ४. गीताके तीसरे अध्यायके सत्ताईसवें, अट्टाईसवें और चौदहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकोंमें समस्त कर्मोंको गुणोंद्वारा किये जाते हुए बतलाया गया है तथा पाँचवें अध्यायके आठवें, नवें श्लोकोंमें सब इन्द्रियोंका इन्द्रियोंके विषयोंमें बरतना कहा गया है और यहाँ सब कर्मोंको प्रकृतिद्वारा किये जाते हुए देखनेको कहते हैं। इस प्रकार तीन तरहके वर्णनका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि सत्त्व, रज और तम--ये तीनों गुण प्रकृतिके ही कार्य हैं तथा समस्त इन्द्रियाँ और मन, बुद्धि आदि एवं इन्द्रियोंके विषय--ये सब भी गुणोंके ही विस्तार हैं। अतएव इन्द्रियोंका इन्द्रियोंक विषयोंमें बरतना, गुणोंका गुणोंमें बरतना और गुणोंद्वारा समस्त कर्मोंको किये जाते हुए बतलाना भी सब कर्मोंको प्रकृतिद्वारा ही किये जाते हुए बतलाना है। अत: सभी जगहोंके कथनका अभिप्राय आत्मामें कर्तापनका अभाव दिखलाना है। आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सब प्रकारके विकारोंसे रहित है; प्रकृतिसे उसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। अतएव वह न किसी भी कर्मका कर्ता है और न कर्मोंके फलका भोक्ता ही है--इस बातका अपरोक्षभावसे अनुभव कर लेना “आत्माको अकर्ता समझना' है तथा जो ऐसा देखता है, वही यथार्थ देखता है। $. जैसे स्वप्नसे जगा हुआ मनुष्य स्वप्रकालमें दिखलायी देनेवाले समस्त प्राणियोंके नानात्वको अपने-आपमें ही देखता है और यह भी समझता है कि उन सबका विस्तार मुझसे ही हुआ था; वस्तुतः स्वप्नकी सृष्टिमें मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था, एक मैं ही अपने-आपको अनेक रूपमें देख रहा था--इसी प्रकार जो समस्त प्राणियोंको केवल एक परमात्मामें ही स्थित और उसीसे सबका विस्तार देखता है, वही ठीक देखता है और इस प्रकार देखना ही सबको एकमें स्थित और उसी एकसे सबका विस्तार देखना है। २. इस अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें जिसको “परमेश्वर', अद्टाईसवेंमें ईश्वर", उनतीसवेंमें आत्मा और तीसेंमें “ब्रह्म' कहा गया है, उसीको यहाँ “परमात्मा” बतलाया गया है अर्थात्‌ इन सबकी अभिन्नता--एकता दिखलानेके लिये यहाँ “अयम्‌' पदका प्रयोग किया गया है। 3. जिसका कोई आदि यानी कारण न हो एवं जिसकी किसी भी कालनमें नयी उत्पत्ति न हुई हो और जो सदासे ही हो, उसे “अनादि' कहते हैं। प्रकृति और उसके गुणोंसे जो सर्वथा अतीत हो, गुणोंसे और गुणोंके कार्यसे जिसका किसी कालमें और किसी भी अवस्थामें वास्तविक सम्बन्ध न हो, उसे “निर्गुण" कहते हैं। अतएव यहाँ “अनादि” और “निर्गुण'-- इन दोनों शब्दोंका प्रयोग करके यह दिखलाया गया है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह आत्मा “अनादि' और “निर्मुण' है; इसलिये वह अकर्ता, निर्लिप्त और अव्यय है--जन्म, मृत्यु आदि छ: विकारोंसे सर्वथा अतीत है। ४. जैसे आकाश बादलोंमें स्थित होनेपर भी उनका कर्ता नहीं बनता और उनसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा कर्मोंका कर्ता नहीं बनता और शरीरोंसे लिप्त भी नहीं होता। ५. आकाशके दृष्टान्तसे आत्मामें निर्लेपता सिद्ध की गयी है। अभिप्राय यह है कि जैसे आकाश वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीमें सब जगह समभावसे व्याप्त होते हुए भी उनके गुण-दोषोंसे किसी तरह भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी इस शरीरमें सब जगह व्याप्त होते हुए भी अत्यन्त सूक्ष्म और गुणोंसे सर्वथा अतीत होनेके कारण बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीरके गुण-दोषोंसे जरा भी लिपायमान नहीं होता। ६, इस श्लोकमें रवि (सूर्य)-का दृष्टान्त देकर आत्मामें अकर्तापनकी और “रवि:' पदके साथ “एक: विशेषण देकर आत्माके अद्वैतभावकी सिद्धि की गयी है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा समस्त क्षेत्रको--यानी इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकोंमें विकारसहित क्षेत्रके नामसे जिसके स्वरूपका वर्णन किया गया है, उस समस्त जडवर्गरूप समस्त जगत्‌को प्रकाशित करता है, सबको सत्ता- स्फूर्ति देता है तथा भिन्न-भिन्न अन्तःकरणोंके सम्बन्धसे भिन्न-भिन्न शरीरोंमें उसका भिन्न-भिन्न प्राकट्य होता-सा देखा जाता है ऐसा होनेपर भी वह आत्मा सूर्यकी भाँति न तो उनके कर्मोंको करनेवाला और न करवानेवाला ही होता है तथा न द्वैतभाव या वैषम्यादि दोषोंसे ही युक्त होता है। वह अविनाशी आत्मा प्रत्येक अवस्थामें सदा-सर्वदा शुद्ध, विज्ञानस्वरूप, अकर्ता, निर्विकार, सम और निरंजन ही रहता है। ३. इस अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवानने जिसको अपने मतसे “ज्ञान” कहा है और गीताके पाँचवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें जिसको अज्ञानका नाश करनेमें कारण बतलाया है, जिसकी प्राप्ति अमानित्वादि साधनोंसे होती है, इस श्लोकमें 'ज्ञानचक्षुषा' पदमें आया हुआ "ज्ञान शब्द उसी “तत्त्वज्ञान” का वाचक है। उस ज्ञानके द्वारा जो भलीभाँति तत्त्वसले यह समझ लेना है कि महाभूतादि चौबीस तत्त्वोंके समुदायरूप समष्टिशरीरका नाम क्षेत्र” है; वह जाननेमें आनेवाला, परिवर्तनशील, विनाशी, विकारी, जड, परिणामी और अनित्य है तथा 'क्षेत्रज्ञ” उसका ज्ञाता (जाननेवाला), चेतन, निर्विकार, अकर्ता, नित्य, अविनाशी, असंग, शुद्ध, ज्ञानस्वरूप और एक है। इस प्रकार दोनोंमें विलक्षणता होनेके कारण क्षेत्रज्ञ क्षेत्रसे सर्वथा भिन्न है। जो उसकी क्षेत्रके साथ एकता प्रतीत होती है, वह अज्ञानमूलक है। वास्तवमें क्षेत्रज्षका उससे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। यही ज्ञानचक्षुके द्वारा 'क्षेत्र” और क्षेत्रज्ञ" के भेदको जानना है। इस श्लोकमें “भूत” शब्द प्रकृतिके कार्यरूप समस्त दृश्यवर्गका और “प्रकृति' उसके कारणका वाचक है। अतः कार्यसहित प्रकृतिसे सर्वथा मुक्त हो जाना ही “भूतप्रकृतिमोक्ष' है तथा उपर्युक्त प्रकारसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको जाननेके साथ-साथ जो क्षेत्रज्ञका प्रकृतिसे अलग होकर अपने वास्तविक परमात्मस्वरूपमें अभिन्न-भावसे प्रतिष्ठित हो जाना है, यही कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त हो जानेको जानना है। अभिप्राय यह है कि जैसे स्वप्नमें मनुष्यको किसी निमित्तसे अपनी जाग्रत्‌-अवस्थाकी स्मृति हो जानेसे यह मालूम हो जाता है कि यह स्वप्न है, अतः अपने असली शरीरमें जग जाना ही इसके दुःखोंसे छूटनेका उपाय है--इस भावका उदय होते ही वह जग उठता है; वैसे ही ज्ञानयोगीका क्षेत्र और क्षेत्रजञ्की विलक्षणताको समझकर साथ-ही-साथ जो यह समझ लेना है कि अज्ञानवश क्षेत्रको सच्ची वस्तु समझनेके कारण ही इसके साथ मेरा सम्बन्ध-सा हो रहा था। अतः वास्तविक सच्चिदा-नन्दघन परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही इससे मुक्त होना है; यही उसका कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त होनेको जानना है। अष्टात्रिशोड ध्याय: (श्रीमद्भगवदगीतायां चतुर्दशो5ध्याय:) ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत्‌की उत्पत्तिका, सत्त्व, रज, तम--तीनों गुणोंका, भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं गुणातीत पुरुषके लक्षणोंका वर्णन सम्बन्ध-गीताके तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र” और क्षेत्रज्ञ" के लक्षणोंका निर्देश करके उन दोनोंके ज्ञानको ही ज्ञान बतलाया और उसके अनुसार क्षेत्रके स्वरूप, स्वभाव, विकार और उसके तत्त्वोंकी उत्पत्तिके क्रम आदि तथा क्षेत्रज्षके स्वरूप और उसके प्रभावका वर्णन किया। वहाँ उन्नीसवें शलोकसे प्रकृति-पुरुषके नामसे प्रकरण आरम्भ करके गुणोंको प्रकृतिजन्य बतलाया और इक्कीसवें शलोकमें यह बात भी कही कि पुरुषके बार-बार अच्छी-बुरी योनियोंगें जन्म होनेगें गुणोंका संग ही हेतु है। इससे गुणोंके भिन्न-भिन्न स्वरूप कया हैं. ये जीवात्माको कैसे शरीरमें बाँधते हैं. किस गुणके संगरसे किस योनिमें जन्म होता है; गुणोंये छूटनेके उपाय कया हैं; गुणोंसे छूटे हुए पुरुषोंके लक्षण तथा आचरण कैसे होते हैं“-ये सब बातें जाननेकी स्वाभाविक ही इच्छा होती है; अतएव इसी विषयका स्पष्टीकरण करनेके लिये इस चौदहवें अध्यायका आरम्भ किया गया है। तेरहवें अध्यायमें वर्णित ज्ञानकों ही स्पष्ट करके चौदहवें अध्यायमें विस्तारपूर्वक समझाते हैं-- श्रीभगवानुवाच परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्‌: | यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता:,श्रीभगवान्‌ बोले--ज्ञानोंमें भी अति उत्तम उस परम ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसारसे मुक्त होकर परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं?

arjuna uvāca

Arjuna said: In the midst of the Kurukṣetra crisis, Arjuna speaks to clarify his understanding and to seek a surer grasp of the teaching being unfolded. His voice represents the ethical tension of a warrior-disciple who must act, yet longs to know the deeper truth that frees action from ego and confusion.

श्रीभगवान्the Blessed Lord
श्रीभगवान्:
Karta
TypeNoun
Rootश्रीभगवत्
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid/spoke
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect, 3, Singular, Parasmaipada
परम्supreme, highest
परम्:
Karma
TypeAdjective
Rootपर
FormNeuter, Accusative, Singular
भूयःagain, once more
भूयः:
TypeIndeclinable
Rootभूयस्
प्रवक्ष्यामिI shall declare
प्रवक्ष्यामि:
TypeVerb
Rootवच्
FormFuture, 1, Singular, Parasmaipada
ज्ञानानाम्of knowledges
ज्ञानानाम्:
TypeNoun
Rootज्ञान
FormNeuter, Genitive, Plural
ज्ञानम्knowledge
ज्ञानम्:
Karma
TypeNoun
Rootज्ञान
FormNeuter, Accusative, Singular
उत्तमम्highest, best
उत्तमम्:
Karma
TypeAdjective
Rootउत्तम
FormNeuter, Accusative, Singular
यत्which
यत्:
Karma
TypePronoun
Rootयद्
FormNeuter, Accusative, Singular
ज्ञात्वाhaving known
ज्ञात्वा:
TypeVerb
Rootज्ञा
Formक्त्वा (absolutive), Parasmaipada (usage)
मुनयःsages
मुनयः:
Karta
TypeNoun
Rootमुनि
FormMasculine, Nominative, Plural
सर्वेall
सर्वे:
Karta
TypeAdjective
Rootसर्व
FormMasculine, Nominative, Plural
पराम्supreme
पराम्:
Karma
TypeAdjective
Rootपरा
FormFeminine, Accusative, Singular
सिद्धिम्perfection, attainment
सिद्धिम्:
Karma
TypeNoun
Rootसिद्धि
FormFeminine, Accusative, Singular
इतःfrom here, from this (world)
इतः:
Apadana
TypeIndeclinable
Rootइतः
गताःgone, attained
गताः:
TypeVerb
Rootगम्
Formक्त (past passive participle), Masculine, Nominative, Plural

अजुन उवाच

A
Arjuna

Educational Q&A

This line functions as a speaker-introduction: it frames Arjuna’s role as the questioning disciple, emphasizing that sincere inquiry is integral to understanding dharma and acting rightly under pressure.

The narration signals a shift to Arjuna’s speech—he is about to ask or respond within the battlefield dialogue, continuing the ethical and spiritual examination that accompanies the impending war.