Daivī–Āsurī Sampad-Vibhāga (दैवी–आसुरी संपद्विभागः) | Division of Constructive and Destructive Dispositions
शी (9) शीश लत 3. गीताके दसवें अध्यायके प्रारम्भमें प्रेम-समुद्र भगवानने “अर्जुन! तुम्हारा मुझमें अत्यन्त प्रेम है, इसीसे मैं ये सब बातें तुम्हारे हितके लिये कह रहा हूँ” ऐसा कहकर अपना जो अलौकिक प्रभाव सुनाया, उसे सुनकर अर्जुनको महर्षियोंकी कही हुई बातोंका स्मरण हो आया। अर्जुनके हृदयपर भगवत्कृपाकी मुहर लग गयी। वे भगवत्कृपाके अपूर्व दर्शन कर आनन्दमुग्ध हो गये; क्योंकि साधकको जबतक अपने पुरुषार्थ, साधन या अपनी योग्यताका स्मरण होता है, तबतक वह भगवत्कृपाके परमलाभसे वंचित-सा ही रहता है; भगवत्कृपाके प्रभावसे वह सहज ही साधनके उच्च स्तरपर नहीं चढ़ सकता, परंतु जब उसे भगवत्कृपासे ही भगवत्कृपाका भान होता है और वह प्रत्यक्षवत् यह समझ जाता है कि जो कुछ हो रहा है, सब भगवानके अनुग्रहसे ही हो रहा है, तब उसका हृदय कृतज्ञतासे भर जाता है और वह पुकार उठता है, 'ओहो, भगवन्! मैं किसी भी योग्य नहीं हूँ। मैं तो सर्वथा अनधिकारी हूँ। यह सब तो आपके अनुग्रहकी ही लीला है। 'ऐसे ही कृतज्ञतापूर्ण हृदयसे अर्जुन कह रहे हैं कि भगवन्! आपने जो कुछ भी महत्त्व और प्रभावकी बातें सुनायी हैं, मैं इसका पात्र नहीं हूँ। आपने अनुग्रह करनेके लिये ही अपना यह परम गोपनीय रहस्य मुझको सुनाया है। “मदनुग्रहाय” पदके प्रयोगका यही अभिप्राय है। $. गीताके सातवेंसे दसवें अध्यायतक विज्ञानसहित ज्ञानके कहनेकी प्रतिज्ञा करके भगवानने जो अपने गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका तत्त्व और रहस्य समझाया है--उस सभी उपदेशका वाचक यहाँ “परम गोपनीय अध्यात्मविषयक वचन” है। जिन-जिन प्रकरणोंमें भगवानने स्पष्टरूपसे यह बतलाया है कि मैं श्रीकृष्ण जो तुम्हारे सामने विराजित हूँ, वही समस्त जगत्का कर्ता, हर्ता, निर्मुण, सगुण, निराकार, साकार, मायातीत, सर्वशक्तिमान्ू, सर्वाधार परमेश्वर हूँ, उन प्रकरणोंको भगवानने स्वयं “परम गुह्ा' बतलाया है। अतएव यहाँ उन्हीं विशेषणोंका लक्ष्य करके अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि आपका यह उपदेश अवश्य ही परम गोपनीय है। २. अर्जुन जो भगवानके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपको पूर्णरूपसे नहीं जानते थे--यही उनका मोह था। अब उपर्युक्त उपदेशके द्वारा भगवानके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य, रहस्य और स्वरूपको कुछ समझकर वे जो यह जान गये हैं कि श्रीकृष्ण ही साक्षात् परमेश्वर हैं--यही उनके मोहका नष्ट होना है। 3. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि केवल भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयकी ही बात आपसे सुनी हो, ऐसी बात नहीं है; आपकी जो अविनाशी महिमा है, अर्थात् आप समस्त विश्वका सृजन, पालन और संहार आदि करते हुए भी वास्तवमें अकर्ता हैं, सबका नियमन करते हुए भी उदासीन हैं, सर्वव्यापी होते हुए भी उन-उन वस्तुओंके गुण-दोषसे सर्वथा निर्लिप्त हैं, शुभाशुभ कर्मोंका सुख-दुःखरूप फल देते हुए भी निर्दयता और विषमताके दोषसे रहित हैं, प्रकृति, काल और समस्त लोक-पालोंके रूपमें प्रकट होकर सबका नियमन करनेवाले सर्वशक्तिमान् भगवान् हैं--इस प्रकारके माहात्म्यको भी उन-उन प्रकरणोंमें बार-बार सुना है। ४. परमेश्वर” सम्बोधनसे अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि आप ईश्वरोंके भी महान ईश्वर हैं और सर्वसमर्थ हैं; अतएव मैं आपके जिस एऐश्वरस्वरूपके दर्शन करना चाहता हूँ, उसके दर्शन आप सहज ही करा सकते हैं। ५. असीम और अनन्त ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि ईश्वरीय गुण और प्रभाव जिसमें प्रत्यक्ष दिखलायी देते हों तथा सारा विश्व जिसके एक अंभशमें हो, ऐसे रूपको यहाँ 'ऐश्वररूप” बतलाया है और उसे मैं देखना चाहता हूँ" इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि ऐसा अद्भुतरूप मैंने कभी नहीं देखा, आपके मुखसे उसका वर्णन सुनकर (गीता १०।४२) उसे देखनेकी मेरे मनमें अत्यन्त उत्कट इच्छा उत्पन्न हो गयी है, उस रूपके दर्शन करके मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा--मैं ऐसा मानता हूँ। ६. 'प्रभो” सम्बोधनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आप सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तथा अन्तर्यामीरूपसे शासन करनेवाले होनेके कारण सर्वसमर्थ हैं। इसलिये यदि मैं आपके उस रूपके दर्शनका सुयोग्य अधिकारी नहीं हूँ तो आप कृपापूर्वक अपने सामर्थ्यसे मुझे सुयोग्य अधिकारी बना सकते हैं। ७. इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि मेरे मनमें आपके उस रूपके दर्शनकी लालसा अत्यन्त प्रबल है आप अन्तर्यामी हैं, देख लें--जान लें कि मेरी वह लालसा सच्ची और उत्कट है या नहीं। यदि आप उस लालसाको सच्ची पाते हैं, तब तो प्रभो! मैं उस स्वरूपके दर्शनका अधिकारी हो जाता हूँ; क्योंकि आप तो भक्त-वांछाकल्पतरु हैं, उसके मनकी इच्छा ही देखते हैं, अन्य योग्यताको नहीं देखते। इसलिये यदि उचित समझें तो कृपा करके अपने उस स्वरूपके दर्शन मुझे कराइये। ३. 'नानाविधानि' पद बहुत-से भेदोंका बोधक है। इसका प्रयोग करके भगवानने विश्वरूपमें दीखनेवाले रूपोंके जातिगत भेदकी अनेकता प्रकट की है--अर्थात् देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि समस्त चराचर जीवोंके नाना भेदोंको अपनेमें देखनेके लिये कहा है। २. अलौकिक और आश्चर्यजनक वस्तुको दिव्य कहते हैं। “दिव्यानि' पदका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मेरे शरीरमें दीखनेवाले ये भिन्न-भिन्न प्रकारके असंख्य रूप सब-के-सब दिव्य हैं। 3. वर्ण” शब्द लाल, पीले, काले आदि विभिन्न रंगोंका और “आकृति” शब्द अंगोंकी बनावटका वाचक है। जिन रूपोंके वर्ण और उनके अंगोंकी बनावट पृथक्-पृथक् अनेकों प्रकारकी हों, उनको “नानावर्णाकृति' कहते हैं। उन्हींके लिये 'नानावर्णाकृतीनि'- का प्रयोग हुआ है। ४. इनका नाम लेकर भगवानने सभी देवताओंको अपने विराट् रूपमें देखनेके लिये अर्जुनको आज्ञा दी है। इनमेंसे आदित्य और मरुद्गणोंकी व्याख्या गीताके दसवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें तथा वसु और रुद्रोंकी तेईसवेंमें की जा चुकी है। इसलिये यहाँ उसका विस्तार नहीं किया गया है। अश्विनीकुमार दोनों भाई देव-वैद्य हैं। ये दोनों सूर्यकी पत्नी संज्ञासे उत्पन्न माने जाते हैं (विष्णुपुराण ३,श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्तेः मे युक्ततमा मता: श्रीभगवान् बोले--मुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-वध्यानमें लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धासे युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वरको भजते हैं,४ वे मुझको योगियोंमें अति उत्तम योगी मान्य हैं
arjuna uvāca
Arjuna said: (The verse introduces Arjuna’s response, marking a shift from listening to Kṛṣṇa’s revelation toward Arjuna’s own inquiry and devotion. In the ethical setting of the battlefield, Arjuna’s voice signals a disciple’s readiness to seek clarity and guidance rather than act from confusion or pride.)
अजुन उवाच
Though brief, the speaker-tag 'Arjuna said' frames the Gītā’s pedagogy: the student must actively respond—questioning, seeking, and consenting to guidance—so that knowledge becomes lived dharma rather than mere information.
The dialogue turns to Arjuna’s voice. After hearing Kṛṣṇa’s preceding instruction, Arjuna begins his next request/inquiry, indicating deepened trust and a readiness to receive further revelation.