Puruṣottama-yoga
The Discipline of the Supreme Person) — Chapter 15 (Bhagavadgītā
सम्बन्ध-- इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अपने विश्वरूपको संवरण करके चतुर्थुजरूपके दर्शन देनेके पश्चात् जब स्वाभाविक मानुषरूपसे युक्त होकर अर्जुनको आश्वासन दिया; तब अर्जुन सावधान होकर कहने लगे-- अजुन उवाच दृष्टवेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं* जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृति गत:,अर्जुन बोले--हे जनार्दन! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूपको देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ;
arjuna uvāca
dṛṣṭvedaṁ mānuṣaṁ rūpaṁ tava saumyaṁ janārdana |
idānīm asmi saṁvṛttaḥ sacetāḥ prakṛtiṁ gataḥ ||
Arjuna said: “O Janārdana, seeing again this gentle human form of Yours, I have now regained composure; my mind is steady, and I have returned to my natural state.”
अजुन उवाच