Ulūpī’s Disclosure and the Saṃjīvana-Maṇi: Arjuna’s Restoration (उलूपी-प्रकटनं संजीवनमणि-स्थापनं च)
यथाकामं व्रजत्येष यज्ञियाश्वो नरर्षभ । स्वस्ति ते5स्तु गमिष्यामि न स्थान विद्यते मम,“नरश्रेष्ठ! यह यज्ञका घोड़ा अपनी इच्छाके अनुसार चलता है (इसे कहीं भी रोकनेका नियम नहीं है); अतः तुम्हारा कल्याण हो। मैं अब जाऊँगा। इस समय मेरे ठहरनेके लिये कोई स्थान नहीं है”
अर्जुन उवाच