Brahmopadeśa on Saṃnyāsa, Tapas, and Jñāna (ब्रह्मोपदेशः—संन्यासतपोज्ञानविमर्शः)
यह देह एक वृक्षके समान है। अज्ञान इसका मूल (जड़) है, बुद्धि स्कन्ध (तना) है, अहंकार शाखा है, इन्द्रियाँ अंकुर और खोखले हैं तथा पञचमहाभूत इसको विशाल बनानेवाले हैं और इस वृक्षकी शोभा बढ़ाते हैं। इसमें सदा ही संकल्परूपी पत्ते उगते और कर्मरूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभाशुभ कर्मोसे प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि ही इसमें सदा लगे रहनेवाले फल हैं। इस प्रकार ब्रह्म॒रूपी बीजसे प्रकट होकर प्रवाहरूपसे सदा मौजूद रहनेवाला यह देहरूपी वृक्ष समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है। बुद्धिमान् पुरुष तत्त्वज्ञानरूपी खड़गसे इस वृक्षको छिन्न-भिन्न कर जब जन्म-मृत्यु और जरावस्थाके चक्करमें डालनेवाले आसक्तिरूप बन्धनोंको तोड़ डालता है तथा ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है, उस समय उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है ।। द्वाविमौ पक्षिणौ नित्यौ संक्षेपौ चाप्पयचेतनौ । एताभ्यां तु परो योअन्यश्लेतनावान् स उच्यते
dvāv imau pakṣiṇau nityau saṅkṣepau cāpy acetānau | etābhyāṁ tu paro yo 'nyaś cetanāvān sa ucyate ||
Vāyu said: “There are two birds that are ever-present—subtle and, in themselves, without independent awareness. Yet beyond these two there is another, higher principle: the truly conscious one. He alone is spoken of as the sentient reality.”
वायुदेव उवाच