त्वमस्य ब्रह्मुलाभस्य दुर्वारस्यानिवर्तिन: । सत्त्वनेमिनिरुद्धस्य चक्रस्यैक: प्रवर्तक:,“अब मुझे निश्चय हो गया कि संसारमें सत्त्वमुणरूप नेमिसे घिरे हुए और कभी पीछेकी ओर न लौवनेवाले इस ब्रह्मप्राप्तिरूप दुर्निवार चक्रका संचालन करनेवाले एकमात्र आप ही हैं!
जनक उवाच