Ādi-parva Adhyāya 97: Satyavatī’s appeal and Bhīṣma’s reaffirmation of satya
गजड़ोवाच एवमेतत् करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम् । नास्य मोघ: संगम: स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह,गंगाजीने कहा--ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लिये किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनी चाहिये
वैशम्पायन उवाच