अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
वैशम्पायन उवाच तं विशोध्य तदा राजा देवदूतेन भारत । हृष्ट: प्रमुदितश्चापि प्रतिजग्राह तं सुतम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--भारत! इस प्रकार देवदूतके वचनसे उस बालककी शुद्धता प्रमाणित करके राजा दुष्यन्तने हर्ष और आनन्दमें मग्न हो उस समय अपने उस पुत्रको ग्रहण किया
वैशम्पायन उवाच