अध्याय ३४ — एलापत्रस्योपदेशः
Elāpatra’s Counsel on the Nāgas’ Deliverance
यत्रेमं तु सहस्राक्ष निक्षिपेयमहं स्वयम् | त्वमादाय तततस्तूर्ण हरेथास्त्रिदिवेश्वर,गरुडने कहा--स्वर्गके सम्राट् सहस्राक्ष! किसी कारणवश मैं यह अमृत ले जाता हूँ। इसे किसीको भी पीनेके लिये नहीं दूँगा। मैं स्वयं जहाँ इसे रख दूँ, वहाँसे तुरंत तुम उठा ले जा सकते हो
गरुड उवाच