कश्यप उवाच कच्चिद् व: कुशल नित्यं भोजने बहुलं सुत । कच्चिच्च मानुषे लोके तवाजन्न॑ विद्यते बहु,कश्यपजीने पूछा--बेटा! तुमलोग कुशलसे तो हो न? विशेषतः प्रतिदिन भोजनके सम्बन्धमें तुम्हें विशेष सुविधा है न? क्या मनुष्यलोकमें तुम्हारे लिये पर्याप्त अन्न मिल जाता है
कश्यप उवाच