त्वमेव मेघस्त्वं वायुस्त्वमन्निर्विद्युतो 5म्बरे । त्वमभ्रगणविक्षेप्ता त्वामेवाहुर्महाघनम्,“तुम्हीं मेघ हो, तुम्हीं वायु हो और तुम्हीं आकाशमें बिजली बनकर प्रकाशित होते हो। तुम्हीं बादलोंको छिन्न-भिन्न करनेवाले हो और दविद्वान् पुरुष तुम्हें ही महामेघ कहते हैं
पितामह उवाच