एतावदुक्त्वा वचन॑ विरराम स पार्थिव: । यदा न शेकू राजानं याजनार्थ परंतप,इतना कहकर राजा चुप हो गये। परंतप जनमेजय! जब वे ऋत्विज राजाका यज्ञ करानेके लिये उद्यत न हो सके, तब वे रुष्ट होकर उन नृपश्रेष्ठसे बोले--“भूपालशिरोमणे! आपके यज्ञकर्म तो निरन्तर चलते रहते हैं
वैशम्पायन उवाच