उच्चैःश्रवसः वर्णविपणः तथा नागशापः
Uccaiḥśravas Color-Wager and the Nāga Curse
नानाविहगसंघुष्टं नानादंष्टिसमाकुलम् । किन्नरैरप्सरोभिश्न देवैरपि च सेवितम्,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकजी! तदनन्तर सम्पूर्ण देवता मिलकर पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलको उखाड़नेके लिये उसके समीप गये। वह पर्वत श्रेत मेघखण्डोंके समान प्रतीत होनेवाले गगनचुम्बी शिखरोंसे सुशोभित था। सब ओर फैली हुई लताओंके समुदायने उसे आच्छादित कर रखा था। उसपर चारों ओर भाँति-भाँतिके विहंगम कलरव कर रहे थे। बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले व्याप्र-सिंह आदि अनेक हिंसक जीव वहाँ सर्वत्र भरे हुए थे। उस पर्वतके विभिन्न प्रदेशोंमें किन्नरगण, अप्सराएँ तथा देवतालोग निवास करते थे। उसकी ऊँचाई ग्यारह हजार योजन थी और भूमिके नीचे भी वह उतने ही सहस्र योजनोंमें प्रतिष्ठित था। जब देवता उसे उखाड़ न सके, तब वहाँ बैठे हुए भगवान् विष्णु और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले--
nānāvihagasaṃghuṣṭaṃ nānādaṃṣṭisamākulam | kinnarair apsarobhiś ca devair api ca sevitam ||
Śaunaka said: “It was resounding with the calls of many kinds of birds, and crowded with creatures of many fearsome fangs. It was frequented and inhabited by Kinnaras, Apsarases, and even the gods.”
शौनक उवाच