अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
यदाओईषं वाससां तत्र राशिं समाक्षिपत् कितवो मन्दबुद्धि: । दुःशासनो गतवान् नैव चान्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय,जब मैंने सुना कि धूर्त एवं मन्दबुद्धि दुःशासनने द्रौपदीका वस्त्र खींचा और वहाँ वस्त्रोंका इतना ढेर लग गया कि वह उसका पार न पा सका; संजय! तभीसे मुझे विजयकी आशा नहीं रही