Uttarā-Pratigrahaṇa and Abhimanyu–Uttarā Vivāha
Virāṭa-parva, Adhyāya 67
इत्येवं तौ भारतमत्स्यवीरौ सम्मन्त्रय सड़म्य तत: शर्मीं ताम् । अभ्येत्य भूयो विजयेन तृप्ता- वुत्सृष्ट मारोपयतां स्वभाण्डम्,क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतस: । जब कौरव-दलके लोग चले गये या इधर-उधर सब दिशाओंमें भाग गये, उस समय बहुत-से कौरवसैनिक जो घने जंगलमें छिपे हुए थे, वहाँसे निकलकर डरते-डरते अर्जुनके पास आये। उनके मनमें भय समा गया था। वे भूखे-प्यासे और थके-माँदे थे। परदेशमें होनेके कारण उनके हृदयकी व्याकुलता और बढ़ गयी थी। वे उस समय केश खोले और हाथ जोड़े हुए खड़े दिखायी दिये इस प्रकार भरतकुल और मत्स्यकुलके उन दोनों वीरोंने आपसमें सलाह करके पूर्वोक्त शमीवृक्षके समीप जा पहलेके उतारे हुए अपने अलंकार आदि शरीरपर धारण कर लिये थे और उनके रखनेके पात्र (भी) रथपर चढ़ा लिये थे
iti evaṁ tau bhāratamatsyavīrau sammantrya śamīṁ tām abhyetya bhūyo vijayena tṛptau utsṛṣṭam āropayatāṁ svabhāṇḍam | kṣutpipāsāpariśrāntā videśasthā vicetasaḥ ||
Demikianlah kedua pahlawan dari wangsa Bharata dan Matsya itu berunding satu sama lain, lalu kembali mendatangi pohon śamī. Puas oleh kemenangan, mereka mengenakan kembali perhiasan dan perlengkapan yang sebelumnya ditanggalkan, serta menaikkan barang-barang mereka ke atas kereta. Sementara itu para prajurit Kaurava—lapar, haus, dan letih, serta makin guncang karena berada di negeri asing—keluar dengan gentar dari persembunyian di rimba lebat, lalu berdiri dengan rambut terurai dan tangan terkatup, menampakkan ketakutan yang dibuka oleh kekalahan.
वैशम्पायन उवाच