
Adhyāya 8 — Vidura’s Return and the Kaurava Counsel (Āraṇyaka-parva)
Upa-parva: Duryodhana–Śakuni–Karṇa Counsel on Vidura’s Return (Court Strategy Episode)
Vaiśaṃpāyana reports that upon hearing Vidura has returned and been pacified by the king, Duryodhana experiences agitation and convenes Śakuni, Karṇa, and Duḥśāsana. Duryodhana frames Vidura as a capable minister aligned with the Pāṇḍavas’ welfare and urges immediate consultation before Vidura can redirect Dhṛtarāṣṭra’s mind. He expresses despair at the prospect of the Pāṇḍavas’ return, using extreme language to signal perceived loss of advantage. Śakuni responds by appealing to the Pāṇḍavas’ commitment to truth and to the binding force of their agreement, arguing they will not accept the king’s reversal; he then proposes continued surveillance for vulnerabilities. Duḥśāsana endorses Śakuni’s reasoning, and Karṇa asserts collective alignment with Duryodhana’s aims. Noting Duryodhana’s dissatisfaction, Karṇa advances a more forceful plan: coordinated mobilization to confront the Pāṇḍavas while they are in the forest and socially constrained. The group assents and departs in separate chariots. Kṛṣṇa-Dvaipāyana Vyāsa, perceiving their movement with divine insight, arrives and restrains them, approaching the seated Dhṛtarāṣṭra to intervene.
Chapter Arc: व्यास धृतराष्ट्र के पास आते हैं और राजधर्म की कठोर वाणी में कहते हैं—‘महाप्राज्ञ! मेरे वचन सुनो’; क्योंकि पाण्डवों का वनवास अन्याय से हुआ है और उसका फल राज्य को भस्म कर सकता है। → व्यास स्पष्ट करते हैं कि उन्हें यह प्रिय नहीं कि दुर्योधन-पुरोगामी कौरवों ने निकृष्ट छल से पाण्डवों को वन भेजा। वे चेताते हैं कि तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होते ही पाण्डव अपने अपमान और क्लेश को स्मरण कर क्रोध-विष को मुक्त करेंगे—और वह विष कौरवों पर ही गिरेगा। → व्यास धृतराष्ट्र के सामने दुर्योधन की ‘सुमन्दधी’ और ‘पापात्मा’ प्रवृत्ति को नग्न कर देते हैं—राज्य-लोभ से वह पाण्डवों के प्रति नित्य संक्रुद्ध है और उन्हें मारना चाहता है। फिर वे तीखा विकल्प रखते हैं: ‘यदि बुद्धि नहीं बदलती तो दुर्योधन को अकेला, असहाय, पाण्डवों के साथ वन भेज दो’—ताकि संसर्ग से स्नेह जागे या उसकी दुष्टता का परिणाम उसी पर पड़े। → व्यास धृतराष्ट्र को स्मरण कराते हैं कि विदुर, भीष्म, कृप, द्रोण और स्वयं व्यास जैसे हितैषी एक ही नीति कहते हैं—दुर्योधन के विचार की उपेक्षा महा-अनर्थ को जन्म देगी। साथ ही वे यह भी स्वीकारते हैं कि जन्मजात स्वभाव प्रायः नहीं छूटता; इसलिए राजा को अभी, ‘अर्थ के बढ़ने से पहले’, क्षम्य और उचित कार्य करना चाहिए। → धृतराष्ट्र के सामने प्रश्न खड़ा रह जाता है—क्या वह पुत्रमोह तोड़कर दुर्योधन को रोकेगा, या चेतावनी की उपेक्षा कर आने वाले विनाश को आमंत्रित करेगा?
Verse 1
हि >> आय न [हुक हि 7 2 अष्टमो> ध्याय: व्यासजीका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके अन्यायको रोकनेके लिये अनुरोध व्यास उवाच धृतराष्ट्र महाप्राज्ञ निबोध वचनं मम । वक्ष्यामि त्वां कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम्,व्यासजीने कहा--महाप्राज्ञ धृतराष्ट्र! तुम मेरी बात सुनो, मैं तुम्हें समस्त कौरवोंके हितकी उत्तम बात बताता हूँ
Vyāsa berkata, “Wahai Dhṛtarāṣṭra yang amat bijaksana, dengarkanlah perkataanku. Akan kukatakan kepadamu nasihat yang paling membawa kebaikan bagi seluruh Kaurava.”
Verse 2
न मे प्रियं महाबाहो यद् गता: पाण्डवा वनम् | निकृत्या निकृताश्चैव दुर्योधनपुरोगमै:,महाबाहो! पाण्डवलोग जो वनमें भेजे गये हैं, यह मुझे अच्छा नहीं लगा है। दुर्योधन आदिने उन्हें छलपूर्वक जूएमें हराया है
Wahai yang berlengan perkasa, aku tidak berkenan para Pāṇḍava pergi ke rimba. Mereka telah dizalimi melalui tipu daya—ditipu dan dikalahkan dalam permainan dadu oleh mereka yang dipimpin Duryodhana.
Verse 3
ते स्मरन्त: परिक््लेशान् वर्षे पूर्णे त्रयोदशे । विमोक्ष्यन्ति विषं क्रुद्धा: कौरवेयेषु भारत,भारत! वे तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर अपनेको दिये हुए क्लेश याद करके कुपित हो कौरवोंपर विष उगलेंगे, अर्थात् विषके समान घातक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करेंगे
Wahai Bhārata, ketika tahun ketiga belas genap, mereka akan mengingat segala derita itu dan, murka, menumpahkan “racun” kepada para Kaurava—yakni menghantam dengan senjata yang mematikan laksana racun.
Verse 4
तदयं कि नु पापात्मा तव पुत्र: सुमन्दधी: । पाण्डवान् नित्यसंक्रुद्धों राज्यहेतोर्जिधांसति,ऐसा जानते हुए भी तुम्हारा यह पापात्मा एवं मूर्ख पुत्र क्यों सदा रोषमें भरा रहकर राज्यके लिये पाण्डवोंका वध करना चाहता है
Meski mengetahui semua itu, mengapa putramu ini—berjiwa berdosa dan berakal sangat tumpul—senantiasa menyala oleh amarah dan hendak membunuh para Pāṇḍava demi kerajaan?
Verse 5
वार्यतां साध्वयं मूढ: शमं गच्छतु ते सुतः । वनस्थांस्तानयं हन्तुमिच्छन् प्राणान् विमोक्ष्यति,तुम इस मूढ़को रोको। तुम्हारा यह पुत्र शान्त हो जाय। यदि इसने वनवासी पाण्डवोंको मार डालनेकी इच्छा की तो यह स्वयं ही अपने प्राणोंको खो बैठेगा
Tahanlah orang dungu ini segera; biarlah putramu menempuh ketenangan dan pengendalian diri. Jika ia ingin membunuh para Pāṇḍava yang tinggal di rimba, pada akhirnya ia sendiri akan melepaskan nyawanya.
Verse 6
यथा हि विदुरः प्राज्ञो यथा भीष्मो यथा वयम् | यथा कृपश्च द्रोणश्व॒ तथा साधुर्भवानपि,जैसे ज्ञानी विदुर, भीष्म, मैं, कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य हैं, वैसे ही साधुस्वभाव तुम भी हो
Sebagaimana Vidura yang bijaksana, sebagaimana Bhīṣma, sebagaimana kami; dan sebagaimana Kṛpa serta Droṇa—demikian pula engkau seorang yang berbudi luhur dan berperilaku baik.
Verse 7
इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें व्यासजीके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला यसातवाँ अध्याय पूरा हुआ,विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्लितः । अधर्म्यमयशस्यं च मा राजन् प्रतिपद्यताम् महाप्राज्ञ! स्वजनोंके साथ कलह अत्यन्त निन्दित माना गया है। वह अधर्म एवं अयश बढ़ानेवाला है; अतः राजन! तुम स्वजनोंके साथ कलहमें न पड़ो
Waiśampāyana berkata: “Wahai yang amat bijaksana, bertikai dengan sanak sendiri sungguh tercela. Itu menumbuhkan adharma dan menambah aib. Karena itu, wahai raja, janganlah engkau memasuki pertentangan dengan kaum kerabatmu sendiri.”
Verse 8
समीक्षा यादृशी हास्य पाण्डवान् प्रति भारत । उपेक्ष्यमाणा सा राजन् महान्तमनयं स्पृशेत्,भारत! पाण्डवोंके प्रति इस दुर्योधनका जैसा विचार है, यदि उसकी उपेक्षा की गयी-- उसका शमन न किया गया तो उसका वह विचार महान् अत्याचारकी सृष्टि कर सकता है इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टमो5ध्याय:
Vyāsa berkata: “Wahai Bhārata, perhatikanlah niat seperti apa yang ia simpan terhadap para Pāṇḍava. Jika niat itu diabaikan, wahai Raja—jika tidak dibendung dan ditenteramkan—ia dapat berkembang menjadi letupan besar adharma dan penindasan.”
Verse 9
अथवायं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुत: । पाण्डवै: सहितो राजन्नेक एवासहायवान्,अथवा तुम्हारा यह मन्दबुद्धि पुत्र अकेला ही दूसरे किसी सहायकको लिये बिना पाण्डवोंके साथ वनमें जाय
Atau, wahai Raja, biarkan putramu yang tumpul budi itu pergi ke hutan bersama para Pāṇḍava—sendirian saja, tanpa penolong dan tanpa sokongan apa pun.
Verse 10
ततः संसर्गज: स्नेह: पुत्रस्य तव पाण्डवै: । यदि स्यात् कृतकार्योड्द्य भवेस्त्वं मनुजेश्वर,मनुजेश्वर! वहाँ पाण्डवोंके संसर्गमें रहनेसे तुम्हारे पुत्रके प्रति उनके हृदयमें स्नेह हो जाय, तो तुम आज ही कृतार्थ हो जाओगे
Kemudian, bila melalui pergaulan terus-menerus dengan para Pāṇḍava putramu menumbuhkan kasih yang tulus kepada mereka, wahai penguasa manusia, maka pada hari ini juga engkau akan mencapai maksudmu.
Verse 11
अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते । श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति,किंतु महाराज! जन्मके समय किसी वस्तुका जैसा स्वभाव बन जाता है वह दूर नहीं होता। भले ही वह वस्तु अमृत ही क्यों न हो? यह बात मेरे सुननेमें आयी है। अथवा इस विषयमें भीष्म, द्रोण, विदुर या तुम्हारी क्या सम्मति है? यहाँ जो उचित हो, वह कार्य पहले करना चाहिये, उसीसे तुम्हारे प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है
Vyāsa berkata: “Lagi pula, wahai Maharaja, watak yang lahir bersama seseorang sejak kelahiran—demikianlah yang didengar—tidak mudah sirna; bahkan bila nektar pun ditawarkan, ia tak serta-merta berubah. Karena itu, pertimbangkan pula apa yang dinilai oleh Bhīṣma, Droṇa, Vidura, atau olehmu sendiri. Apa yang patut hendaknya dilakukan terlebih dahulu; dengan itulah tujuanmu akan tercapai.”
Verse 12
कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणो5थ विदुरो5पि वा। भवान् वात्र क्षमं कार्य पुरा वोडर्थोडभिवर्धते,किंतु महाराज! जन्मके समय किसी वस्तुका जैसा स्वभाव बन जाता है वह दूर नहीं होता। भले ही वह वस्तु अमृत ही क्यों न हो? यह बात मेरे सुननेमें आयी है। अथवा इस विषयमें भीष्म, द्रोण, विदुर या तुम्हारी क्या सम्मति है? यहाँ जो उचित हो, वह कार्य पहले करना चाहिये, उसीसे तुम्हारे प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है
Vyāsa berkata: “Kalau begitu, apakah pandangan Bhīṣma—atau Droṇa, atau Vidura? Dan bagaimana penilaianmu sendiri di sini? Dalam perkara ini, jalan yang sungguh patut hendaknya ditempuh terlebih dahulu; dengan itulah tujuanmu akan paling baik tercapai.”
The chapter stages a tension between ethical governance through wise counsel (Vidura’s influence on Dhṛtarāṣṭra) and factional strategy that prioritizes advantage, including proposals to act before lawful agreements and moral restraints can reassert themselves.
Counsel (mantra) is shown as a decisive instrument of polity: when rulers fear corrective advice, they may substitute urgency and consensus rhetoric for discernment, thereby accelerating instability; restraint and right counsel function as stabilizers of dharma.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the meta-function is narrative: Vyāsa’s arrival operates as an authorial-ethical intervention, signaling that unchecked factional action is subject to higher corrective authority within the epic’s moral architecture.