अध्याय १४९ — हनूमतो महद्रूपदर्शनं तथा धर्म-नीति-उपदेशः
Hanūmān’s Vast Form and Instruction on Dharma–Statecraft
ततः प्रत्याहता भार्या नष्टा वेदश्रुतिर्यथा । तयैव सहित: साध्व्या पत्न्या रामो महायशा:,तत्पश्चात् धर्मात्मा, भक्तिमान् तथा भक्तों और सेवकोंपर स्नेह रखनेवाले राक्षसराज विभीषणको लंकाके राज्यपर अभिषिक्त किया और खोयी हुई वैदिकी श्रुतिकी भाँति अपनी पत्नीका वहाँसे उद्धार करके महायशस्वी रघुनन्दन श्रीराम अपनी उस साध्वी पत्नीके साथ ही बड़ी उतावलीके साथ अपनी अयोध्यापुरीमें लौट आये। इसके बाद शत्रुओंको भी वशमें करनेवाले नृपश्रेष्ठ भगवान् श्रीराम अवधके राज्यसिंहासनपर आसीन हो उस अजेय अयोध्यापुरीमें रहने लगे। उस समय मैंने कमलनयन श्रीरामसे यह वर माँगा कि “शत्रुसूदन! जबतक आपकी यह कथा संसारमें प्रचलित रहे तबतक मैं अवश्य जीवित रहूँ"। भगवानने “तथास्तु” कहकर मेरी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली
tataḥ pratyāhatā bhāryā naṣṭā vedaśrutir yathā | tayāiva sahitaḥ sādhvyā patnyā rāmo mahāyaśāḥ ||
Kemudian sang istri—yang dahulu disingkirkan—didapatkan kembali, laksana śruti Weda yang hilang dipulihkan. Dan Rāma yang termasyhur kembali bersatu, ditemani oleh istri yang suci itu. Pemulihan ini diserupakan dengan kembalinya pengetahuan sakral yang sempat lenyap.
वैशम्पायन उवाच