अभिमन्यु-परिवेष्टनम्
Encirclement and Counterassault of Abhimanyu
एको विष्णुरिवाचिन्त्यं कृत्वा कर्म सुदुष्करम् | राजन्! आपके वनायुज, पर्वतीय, काम्बोज तथा बाह्लिक देशीय श्रेष्ठ घोड़ोंको, जो पूँछ, कान और नेत्रोंको निश्चल करके दौड़नेवाले, वेगवान् और अच्छी तरह सवारीका काम देनेवाले थे तथा जिनके ऊपर शक्ति, ऋष्टि एवं प्रासद्वारा युद्ध करनेवाले सुशिक्षित योद्धा सवार थे, धराशायी करता हुआ अकेला वीर अभिमन्यु एकमात्र भगवान् विष्णुकी भाँति अचिन्त्य एवं दुष्कर कर्म करके बड़ी शोभा पा रहा था। उन घोड़ोंके मस्तक और गर्दनके चँवरके समान बड़े-बड़े बाल और मुख बाणोंके आघातसे नष्ट हो गये थे। वे सब-के-सब घायल हो गये थे। कितने ही अश्वोंके सिर छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये थे। कितनोंकी जिह्ना और नेत्र बाहर निकल आये थे। आँत और जिगरके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। उन सबके सवार मार डाले गये थे। उनके गलेके घुँघचुरू कटकर गिर गये थे। वे घोड़े मृत्युके अधीन होकर मांसभक्षी प्राणियोंका हर्ष बढ़ा रहे थे। उनके चमड़े और कवच टूक-टूक हो गये थे और वे मल-मूत्र तथा रक्तमें डूबे हुए थे || ३६--३९ $ ।। तथा निर्मथितं तेन त्यड्रं तव बल॑ महत्
Sañjaya berkata: Wahai Raja, seorang diri Abhimanyu bagaikan Dewa Viṣṇu, melakukan perbuatan yang tak terpikirkan dan amat sukar, lalu tampak mulia; ia mengaduk-aduk dan menghancurkan bala besarmu yang tersusun dari tiga unsur—kereta, gajah, dan kuda.
संजय उवाच