द्रोणपर्व — अध्याय २७: सुशर्माह्वानम्, अर्जुनस्य प्रतिनिवर्तनम्, भगदत्तेन गजप्रहारः
दृप्तं संख्ये द्विघषबलादू् वयसा चापि विस्मितम् । अद्यैनं प्रेषयिष्यामि बलहन्तु: प्रियातिथिम्,“अपने हाथीके बलसे युद्धमें घमंड दिखानेवाले और अवस्थामें भी बड़े होनेका अहंकार रखनेवाले इन राजा भगदत्तको मैं देवराज इन्द्रका प्रिय अतिथि बनाकर स्वर्गलोक भेज दूँगा'
Raja Bhagadatta ini, yang pongah di medan laga karena kekuatan gajahnya dan terpesona oleh kesombongan usia, hari ini akan kukirim sebagai tamu kesayangan Indra, sang pembunuh Bala, ke surga.
संजय उवाच