Adhyaya 142
Anushasana ParvaAdhyaya 14234 Verses

Adhyaya 142

Adhyāya 142: Cyavana, the Devas’ Arrogance, and Vāyu’s Counsel on Protecting Brāhmaṇas

Upa-parva: Anuśāsana Instructional Cycle on Brāhmaṇa-Dharma and Kṣatra Protection (Contextual Episode)

Bhīṣma continues the didactic frame: Arjuna remains silent as Pavana (Vāyu) resumes instruction, urging the listener (Janādhipa) to understand the ‘chief duty’ concerning Brāhmaṇas. An exemplum follows: when the devas, including Indra, become intoxicated with pride, Cyavana deprives them of their earthly domain, and (by the chapter’s phrasing) their heaven is also imperiled; distressed, they approach Brahmā for refuge. Brahmā directs them to seek Brāhmaṇas and regain both worlds through appeasement. The devas approach the Brāhmaṇas, but the exchange escalates into a contest framed as victory over the ‘kapas’; the Brāhmaṇas initiate a destructive rite, and a wealthy emissary attempts conciliation by praising the Brāhmaṇas’ virtues—Vedic learning, sacrificial discipline, truthfulness, restraint, non-exploitative conduct, care for dependents, and regulated habits. The Brāhmaṇas refuse, asserting superiority; conflict ensues, and ritual fire—described as Brahmā-created ‘havyabhuj’—consumes the opposing party, after which the devas’ power and status are restored. Returning to the frame, Arjuna replies with reverence, affirming lifelong service to Brāhmaṇas and crediting Dattātreya’s grace for his fame. Vāyu concludes with a directive: protect Brāhmaṇas according to kṣatra-dharma, restrain the senses, and note a future grave danger associated with the Bhṛgus.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के मन में दान और प्रायश्चित्त के सूक्ष्म नियमों को लेकर शंका उठती है—‘ग्रहसूतक’ जैसे शब्दों का सही अर्थ क्या है, और अशौच/अपवित्रता की स्थितियों में धर्म का आचरण कैसे हो? → भीष्म उत्तर देते हुए राजाओं और महर्षियों के उदाहरणों की शृंखला खोलते हैं—तप, दान, और धर्मसम्मत दण्ड-नीति से किन-किन ने ‘अनुत्तम लोक’ प्राप्त किए। हर कथा एक नया मानदण्ड रखती है: कहीं यज्ञार्थ दान, कहीं कन्यादान, कहीं न्यायपूर्ण दण्ड। → उदाहरणों का शिखर उस बोध में आता है कि केवल दान की मात्रा नहीं, उसका ‘धर्म-नियत’ स्वरूप (पात्र, काल, विधि, और शुद्ध भाव) ही लोक-प्राप्ति का कारण बनता है—देवावृध का यज्ञार्थ दिव्य दान, सुद्युम्न का धर्मतः दण्ड, और भगीरथ/मदिराश्व/लोमपाद के कन्यादान—सब एक ही सिद्धान्त को उजागर करते हैं। → भीष्म संकेत करते हैं कि शास्त्रीय निर्णय में संध्या-काल की मर्यादा भी धर्म है; अतः वे कहते हैं कि जहाँ शंका होगी, उसका उत्तर वे अगले प्रातः स्पष्ट करेंगे। → भीष्म का वचन—‘कल प्रभात में बताऊँगा’—युधिष्ठिर की शंकाओं को अगले उपदेश के लिए खुला छोड़ देता है।

Shlokas

Verse 1

2: बछ। अकाल - कुछ लोग 'ग्रहसूतकयो:” का अर्थ करते हैं "कारागारस्थाशौचवतो” इसके अनुसार जो जेलमें रह आया हो तथा जो जनन-मरण-सम्बन्धी अशौचसे युक्त हो ऐसे लोगोंका दिया हुआ क्षेत्रदान स्वीकार करनेपर तीन रात उपवास करनेसे प्रतिग्रह-दोषसे छुटकारा मिलता है। सप्तत्रिशर्दाधिकशततमोब< ध्याय: दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन युधिछिर उवाच दानेन वर्ततेत्याह तपसा चैव भारत । तदेतन्मे मनोदु:खं व्यपोह त्वं पितामह । किंस्वित्‌ पृथिव्यां होतन्मे भवान्‌ शंसितुमरहति,युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! पितामह! आप कहते हैं कि दान और तप दोनोंसे ही मनुष्य स्वर्गमें जाता है, परंतु मेरे मनमें संशयजनित दुःख हो रहा है। आप इसका निवारण कीजिये। इस पृथ्वीपर दान और तपमेंसे कौन-सा साधन श्रेष्ठ है, यह बतानेकी कृपा करें

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhārata, engkau telah menyatakan bahwa seseorang mencapai alam surga melalui dana (pemberian), dan juga melalui tapa (askese). Namun duka yang lahir dari keraguan mengusik batinku—lenyapkanlah itu, wahai Kakek Agung. Di bumi ini, manakah yang sungguh lebih utama bagiku: dana atau tapa? Mohon jelaskan.”

Verse 2

भीष्म उवाच शृणु यैर्धर्मनिरतैस्तपसा भावितात्मभि: । लोका हासंशयं प्राप्ता दानपुण्यरतैर्नुपै:,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! तपस्यासे शुद्ध अन्तः:करणवाले जिन धर्मात्मा राजाओंने दान-पुण्यमें तत्पर रहकर नि:सन्देह बहुत-से उत्तम लोक प्राप्त किये हैं, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो

Bhīṣma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, dengarkanlah tentang para raja yang teguh dalam dharma, yang jiwanya ditempa oleh tapa, dan yang tekun dalam dana serta kebajikan; merekalah yang tanpa ragu telah mencapai alam-alam mulia.”

Verse 3

सत्कृतश्न तथा<<त्रेय: शिष्येभ्यो ब्रह्म निर्गुणम्‌ । उपदिश्य तदा राजन्‌ गतो लोकाननुत्तमान्‌,राजन्‌! लोकसम्मानित महर्षि आत्रेय अपने शिष्योंको निर्गुण ब्रह्मका उपदेश देकर उत्तम लोकोंमें गये हैं

Wahai Raja, resi Ātreya yang dimuliakan dunia mengajarkan kepada para siswanya Brahman yang nirguṇa (tanpa sifat); setelah menyampaikan ajaran tertinggi itu, ia berangkat menuju alam-alam yang tiada banding.

Verse 4

शिबिरौशीनर: प्राणान्‌ प्रियस्य तनयस्य च । ब्राह्मणार्थमुपाकृत्य नाकपृष्ठमितो गत:

Raja Śibi dari wangsa Uśīnara, demi seorang brāhmaṇa, mempersembahkan nyawanya sendiri—bahkan nyawa putranya yang tercinta—lalu berangkat dari dunia ini menuju alam surga.

Verse 5

उशीनरकुमार शिवि अपने प्यारे पुत्रके प्राणोंको ब्राह्मणके लिये निछावर करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये ।। प्रतर्दन: काशिपति: प्रदाय तनयं स्वकम्‌ । ब्राह्मणायातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्षुते,काशीके राजा प्रतर्दनने अपने प्यारे पुत्रको ब्राह्मणकी सेवामें अर्पित कर दिया, जिसके कारण उन्हें इस लोकमें अनुपम कीर्ति मिली और परलोकमें भी वे अक्षय आनन्दका उपभोग कर रहे हैं

Śibi, pangeran dari wangsa Uśīnara, mengorbankan nyawa putranya yang tercinta demi seorang brāhmaṇa, lalu dari sini mencapai alam surga. Demikian pula Pratardana, penguasa Kāśī, menyerahkan putranya sendiri untuk melayani seorang brāhmaṇa; karena itu ia meraih kemasyhuran tiada tara di dunia ini dan, di alam sana, menikmati kebahagiaan yang tak binasa.

Verse 6

रन्तिदेवश्व सांकृत्यो वसिष्ठाय महात्मने । अर्घ्य प्रदाय विधिवल्लेभे लोकाननुत्तमान्‌,संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवने महात्मा वसिष्ठ मुनिको विधिवत्‌ अर्घ्यदान किया, जिससे उन्हें श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हुई

Bhishma berkata: Raja Rantideva, putra Saṅkṛti, dengan tata cara yang semestinya mempersembahkan arghya kepada resi agung Vasiṣṭha; berkat penghormatan itu ia meraih dunia-dunia tertinggi yang tiada banding.

Verse 7

दिव्यं शतशलाकं च यज्ञार्थ काउचनं शुभम्‌ | छत्र॑ देवावृधो दत्त्वा ब्राह्मणायास्थितो दिवम्‌,देवावृध नामक राजा यज्ञमें सोनेकी सौ तीलियोंवाले सुन्दर दिव्य छत्रका ब्राह्मणको दान करके स्वर्ग-लोकको प्राप्त हुए हैं

Bhishma berkata: Raja Devāvṛdha menghadiahkan kepada seorang brāhmaṇa sebuah payung agung—emas, suci, bersifat ilahi—berjeruji seratus untuk keperluan yajña; dan ia pun mencapai surga.

Verse 8

भगवानम्बरीष श्च ब्राह्मणायामितौजसे । प्रदाय सकल राष्ट्र सुरलोकमवाप्तवान्‌,ऐश्वर्यशशाली राजा अम्बरीष अमित तेजस्वी ब्राह्मणको अपना सारा राज्य सौंपकर देवलोकको प्राप्त हुए

Bhishma berkata: Raja Ambarīṣa yang termasyhur menyerahkan seluruh kerajaannya sebagai dāna kepada seorang brāhmaṇa yang berdaya rohani tak terukur; dengan pelepasan itu ia mencapai alam para dewa.

Verse 9

सावित्र: कुण्डलं दिव्यं यानं च जनमेजय: । ब्राह्मणाय च गा दत्त्वा गतो लोकाननुत्तमान्‌,सूर्यपुत्र कर्ण अपना दिव्य कुण्डल देकर तथा महाराजा जनमेजय ब्राह्मणको सवारी और गौ दान करके उत्तम लोकोंमें गये हैं

Bhishma berkata: Sāvitra mendermakan anting ilahinya; dan Raja Janamejaya menghadiahkan kepada seorang brāhmaṇa sebuah kendaraan serta sapi-sapi—maka keduanya mencapai dunia-dunia tertinggi yang tiada banding.

Verse 10

वृषादर्भिश्न राजर्षी रत्नानि विविधानि च । रम्यांक्षावसथान्‌ दत्त्वा द्विजेभ्यो दिवमागत:,राजर्षि वृषादर्भिने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न तथा रमणीय गृह प्रदान करके स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त किया है

Bhishma berkata: Resi-raja Vṛṣādarbhisna menganugerahkan kepada para dvija (brāhmaṇa) berbagai permata serta kediaman-kediaman yang elok; dan ia pun mencapai surga.

Verse 11

निमी राष्ट्रं च वैदर्भि: कन्यां दत्त्वा महात्मने । अगस्त्याय गतः स्वर्ग सपुत्रपशुबान्धव:,विदर्भके पुत्र राजा निमि अगस्त्य मुनिको अपनी कन्या और राज्यका दान करके पुत्र, पशु और बान्धवोंसहित स्वर्गलोकमें चले गये

Bhishma berkata: Raja Nimi dari Vidarbha, setelah menganugerahkan kerajaannya dan putrinya kepada resi Agastya yang berhati luhur, berangkat ke surga bersama putra-putranya, ternaknya, dan para kerabatnya.

Verse 12

जामदग्न्यश्न विप्राय भूमिं दत््वा महायशा: । रामो3क्षयांस्तथा लोकान्‌ जगाम मनसो5डघिकान्‌,महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजीने ब्राह्मणको भूमिदान करके उन अक्षय लोकोंको प्राप्त किया है, जिन्हें पानेकी मनमें कल्पना भी नहीं हो सकती

Bhishma berkata: Rama putra Jamadagni (Parashurama) yang termasyhur, setelah menganugerahkan bumi sebagai dana kepada seorang brahmana, mencapai alam-alam yang tak binasa—bahkan melampaui jangkauan bayangan pikiran.

Verse 13

अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि देवराट्‌ । वसिष्ठो जीवयामास येन यातो$क्षयां गतिम्‌,एक बार संसारमें वर्षा न होनेपर मुनिवर वसिष्ठजीने समस्त प्राणियोंको जीवन दान दिया था, जिससे उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई

Bhishma berkata: Ketika hujan tak turun dan semua makhluk menderita, resi agung Vasistha menghidupkan kembali mereka dengan anugerah kehidupan; melalui perbuatan itu ia meraih keadaan yang tak binasa.

Verse 14

रामो दाशरथिश्वैव हुत्वा यज्ञेषु वै वसु । स गतो हाक्षयाँललोकान्‌ यस्य लोके महद्‌ यश:,दशरथनन्दन भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी यज्ञोंमें प्रचुर धनकी आहुति देकर संसारमें अपने महान्‌ यशकी स्थापना करके अक्षय लोकोंमें चले गये

Bhishma berkata: Rama putra Dasharatha, setelah mempersembahkan kekayaan berlimpah sebagai oblation dalam yajña, menegakkan kemasyhuran besar di dunia ini, lalu mencapai alam-alam yang tak binasa.

Verse 15

कक्षसेनश्न्‌ राजर्षिवेसिष्ठाय महात्मने । न्यासं यथावत्‌ संन्‍्यस्थ जगाम सुमहायशा:,महायशस्वी राजर्षि कक्षसेन महात्मा वसिष्ठको अपना सर्वस्व समर्पण करके स्वर्गलोकमें गये हैं

Bhishma berkata: Resi-raja Kakshasena yang sangat termasyhur, setelah menyerahkan seluruh miliknya kepada resi agung Vasistha sebagai titipan suci (nyāsa) menurut tata cara yang benar, berangkat menuju surga.

Verse 16

करन्धमस्य पौत्रस्तु मरुत्तोडविक्षित: सुतः । कन्यामांगिरसे दत्त्वा दिवमाशु जगाम सः:,करन्धमके पौत्र, अविक्षित॒के पुत्र महाराज मरुत्तने अंगिराके पुत्र संवर्तको कन्यादान करके शीघ्र ही स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया

Bhishma bersabda: “Marutta, cucu Karandhama dan putra Avikṣit, setelah menyerahkan putrinya dalam kanyādāna kepada seorang keturunan Aṅgiras, dengan segera mencapai surga.”

Verse 17

ब्रह्मदत्तश्न पाज्चाल्यो राजा धर्मभृतां वर: । निर्धि शड्खमनुज्ञाप्प जगाम परमां गतिम्‌,पाञ्चालदेशके राजा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मदत्तने ब्राह्यणको शंखनामक निधि प्रदान करके परम गति प्राप्त कर ली थी

Bhishma bersabda: “Raja Brahmadatta dari Panchala, yang utama di antara para penegak dharma, menganugerahkan kepada seorang brāhmaṇa harta bernama ‘Shankha’ dan dengan kebajikan itu mencapai keadaan tertinggi.”

Verse 18

राजा मित्रसहश्चैव वसिष्ठाय महात्मने । मदयमन्तीं प्रियां भार्या दत्त्वा च त्रिदिवं गत:,राजा मित्रसह महात्मा वसिष्ठ मुनिको अपनी प्यारी पत्नी मदयन्ती सेवाके लिये देकर स्वर्गलोकमें चले गये

Bhishma bersabda: “Raja Mitrasaha, setelah menyerahkan istri tercintanya Madayantī kepada resi agung Vasiṣṭha untuk pelayanan, kemudian berangkat menuju dunia surga.”

Verse 19

मनो: पुत्रश्न सुद्युम्नो लिखिताय महात्मने । दण्डमुद्धृत्य धर्मेण गतो लोकाननुत्तमान्‌,मनुपुत्र राजा सुद्युम्न महात्मा लिखितको धर्मतः दण्ड देकर परम उत्तम लोकोंमें गये

Bhishma bersabda: “Sudyumna, putra Manu, setelah menegakkan hukuman sesuai dharma dalam perkara resi agung Likhita, mencapai alam-alam yang tiada banding.”

Verse 20

सहस्रचित्यो: राजर्षि: प्राणानिष्टान्‌ महायशा: । ब्राह्मणार्थे परित्यज्य गतो लोकाननुच्तमान्‌

Bhishma bersabda: “Sahasracitya, sang rājarsi yang termasyhur, demi kepentingan seorang brāhmaṇa melepaskan bahkan nyawanya yang paling ia sayangi; dan karena pengorbanan itu ia mencapai alam-alam tertinggi.”

Verse 21

महान्‌ यशस्वी राजर्षि सहस्नचित्य ब्राह्मणके लिये अपने प्यारे प्राणोंकी बलि देकर श्रेष्ठ लोकोंमें गये हैं ।। सर्वकामैश्व सम्पूर्ण दत्त्वा वेश्म हिरण्मयम्‌ । मौद्गल्याय गतः स्वर्ग शतद्युम्नो महीपति:,महाराजा शत्द्युम्नने मौदगल्य नामक ब्राह्मणको समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण सुवर्णमय गृह दान देकर स्वर्ग प्राप्त किया है

Bhishma berkata: Raja Śatadyumna, setelah menganugerahkan kepada brahmana Maudgalya sebuah rumah emas yang lengkap dengan segala kenyamanan yang diinginkan, mencapai surga. Petikan ini menegaskan daya kebajikan dari kedermawanan yang utuh dan tanpa pamrih—terutama kepada penerima yang layak—sebagai dharma seorang raja yang mengantarkan ke alam-alam luhur.

Verse 22

भ्क्ष्यभोज्यस्य च कृतान्‌ राशय: पर्वतोपमान्‌ | शाण्डिल्याय पुरा दत्त्वा सुमन्युर्दिवमास्थित:

Bhishma berkata: “Dahulu raja resi Sumanyu memberikan kepada Śāṇḍilya tumpukan besar makanan siap santap—hidangan dan masakan—menggunung laksana pegunungan; setelah itu ia mencapai surga.”

Verse 23

राजा सुमन्युने भक्ष्य, भोज्य पदार्थोंके पर्वत-जैसे कितने ही ढेर लगाकर उन्हें शाण्डिल्यको दान दिया था। जिससे उन्होंने स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ।। नाम्ना च द्युतिमान्‌ नाम शाल्वराजो महाद्युति: । दत्त्वा राज्यमूचीकाय गतो लोकाननुत्तमान्‌,महातेजस्वी शाल्वराज द्युतिमान्‌ महर्षि ऋचीकको राज्य देकर सर्वोत्तम लोकोंमें चले गये

Bhishma berkata: Raja Sumanyu menimbun persediaan makanan—yang dapat dimakan dan hidangan siap santap—setinggi gunung, lalu mendermakannya kepada Śāṇḍilya; oleh kebajikan itu ia memperoleh tempat di surga. Demikian pula raja Śalva yang termasyhur, Dyutiman—bercahaya dan perkasa—menyerahkan kerajaannya kepada resi Richika dan berangkat menuju alam-alam yang tiada banding. Petikan ini menonjolkan kemuliaan memberi dan laku pelepasan kedaulatan demi pencapaian rohani yang lebih tinggi.

Verse 24

मदिराश्चश्व राजर्षिददत््वा कन्यां सुमध्यमाम्‌ | हिरण्यहस्ताय गतो लोकान्‌ देवैरधिष्ठितान्‌

Bhishma berkata: Raja resi Madirāśvā pun, setelah menyerahkan seorang gadis berpinggang ramping kepada Hiraṇyahasta sebagai ikatan pernikahan, berangkat menuju alam-alam yang dipimpin para dewa. Ini menandai buah kebajikan dari pemberian yang benar serta tata laku pernikahan yang sesuai dharma.

Verse 25

राजर्षि मदिराश्व अपनी सुन्दरी कन्या विप्रवर हिरण्यहस्तको देकर देवताओंके लोकमें चले गये ।। लोमपादश्न राजर्षि: शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभु: ऋष्यश्‌ज्भाय विपुलै: सर्वे: कामैरयुज्यत,प्रभावशाली राजर्षि लोमपादने मुनिवर ऋष्यशृंगको अपनी शान्ता नामवाली कन्या दान की थी, इससे उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्णरूपसे सफल हुईं

Bhishma berkata: Raja resi Madirāśva menyerahkan putrinya yang elok kepada brahmana utama Hiraṇyahasta, lalu berangkat menuju alam para dewa. Demikian pula raja resi Lomapada yang berkuasa, dengan memberikan putrinya bernama Śāntā sebagai ikatan pernikahan kepada resi agung R̥śyaśṛṅga, menjadi bersatu dengan kemakmuran yang melimpah dan melihat segala tujuannya terpenuhi. Ini menunjukkan bahwa memuliakan orang saleh dan menopang para pertapa membawa kesejahteraan duniawi sekaligus pahala dharma.

Verse 26

कौत्साय दत्त्वा कन्यां तु हंसीं नाम यशस्विनीम्‌ | गतो$क्षयानतो लोकानू्‌ राजर्षिश्ष भगीरथ:,राजर्षि भगीरथ अपनी यशस्विनी कन्या हंसीका कौत्स ऋषिको दान करके अक्षय लोकोंमें गये हैं

Bhīṣma bersabda: Setelah menyerahkan putrinya yang termasyhur bernama Haṃsī sebagai kanyādāna (pemberian putri dalam pernikahan) kepada resi Kautsa menurut dharma, rajarṣi Bhāgīratha mencapai loka-loka yang tak binasa.

Verse 27

दत्त्वा शतसहस्र॑ तु गवां राजा भगीरथ: । सवत्सानां कोहलाय गतो लोकाननुत्तमान्‌,राजा भगीरथने कोहल नामक ब्राह्णको एक लाख सवत्सा गौएँ दान कीं, जिससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई

Bhīṣma bersabda: Raja Bhāgīratha, setelah menganugerahkan seratus ribu ekor sapi—masing-masing beserta anaknya—kepada brahmana bernama Kohala, mencapai loka-loka yang tertinggi.

Verse 28

एते चान्ये च बहवो दानेन तपसा च ह । युधिष्ठिर गताः स्वर्ग विवर्तन्ते पुनः पुन:,युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुत-से राजा दान और तपस्याके प्रभावसे बारंबार स्वर्गलोकको जाते और पुनः वहाँसे इस लोकमें लौट आते हैं

Bhīṣma bersabda: “Wahai Yudhiṣṭhira, mereka ini dan banyak raja lainnya, oleh daya derma dan tapa, mencapai surga; namun dari sana mereka kembali lagi dan lagi ke dunia ini.”

Verse 29

तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तियावत्‌ स्थास्यति मेदिनी । गृहस्थैर्दानतपसा यैलोंका वै विनिर्जिता:,जिन गृहस्थोंने दान और तपस्याके बलसे उत्तम लोकोंपर विजय पायी है, उनकी कीर्ति इस लोकमें तबतक प्रतिष्ठित रहेगी, जबतक कि यह पृथ्वी स्थिर रहेगी

Bhīṣma bersabda: Kemasyhuran para gṛhastha yang, melalui derma dan tapa, telah menaklukkan bagi diri mereka loka-loka yang luhur, akan tetap tegak di dunia ini selama bumi masih bertahan.

Verse 30

शिष्टानां चरितं होतत्‌ कीर्तितं मे युधिष्ठिर । दानयज्ञप्रजासगैरेते हि दिवमास्थिता:,युधिष्ठिर! यह शिष्ट पुरुषोंका चरित्र बताया गया है। ये सब नरेश दान, यज्ञ और संतानोत्पादन करके स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए हैं

Bhīṣma bersabda: “Wahai Yudhiṣṭhira, demikianlah telah kuceritakan laku para śiṣṭa—orang-orang berbudaya dan saleh. Sesungguhnya para raja ini bersemayam di surga melalui dāna, yajña, dan prajā-sarga (melanjutkan keturunan).”

Verse 31

दत्त्वा तु सततं ते5स्तु कौरवाणां धुरन्धर | दानयज्ञक्रियायुक्ता बुद्धिर्धमोपचायिनी,कौरवधुरंधर! तुम भी सदा दान करते रहो। तुम्हारी बुद्धि दान और यज्ञकी क्रियामें संलग्न हो धर्मकी उन्नति करती रहे

Bhīṣma berkata: “Wahai pemikul beban kaum Kaurava yang utama, jadilah engkau yang senantiasa memberi. Semoga buddhi-mu tetap terikat pada laku dana dan yajña, dan dengan itu terus menumbuhkan dharma.”

Verse 32

यत्र ते नृपशार्दूल संदेहो वै भविष्यति । श्वः प्रभाते हि वक्ष्यामि संध्या हि समुपस्थिता,नृपश्रेष्ठी अब तुम्हें जिस विषयमें संदेह होगा, उसे मैं कल सबेरे बताऊँगा; क्योंकि इस समय संध्याकाल उपस्थित है

Bhīṣma berkata: “Wahai harimau di antara para raja, apa pun yang membuatmu ragu, akan kujelaskan besok saat fajar; sebab kini waktu sandhyā (senja) telah tiba.”

Verse 136

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें प्रायक्षित्तविधि नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-136, berjudul “Tata Cara Prāyaścitta (Penebusan),” dalam bagian Dāna-dharma pada Anuśāsana Parva dari Mahābhārata yang suci.

Verse 137

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमो ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva—khususnya bagian Dāna-dharma—bab ke-137 berakhir.

Frequently Asked Questions

The tension is between power asserted through pride and power disciplined by dharma: the devas’ arrogance leads to loss, while restoration depends on seeking refuge, honoring Brāhmaṇical authority, and acting with restraint rather than entitlement.

A ruler (and warrior) should protect Brāhmaṇas through kṣatra-dharma and simultaneously cultivate indriya-nigraha; social order is sustained by disciplined force aligned with reverence for sacred learning.

No explicit phalaśruti formula is stated in these verses; instead, the chapter implies consequential ‘fruit’ through the exemplum—loss from pride and restoration through appeasement and dharmic discipline.