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Sukta 9.12
Soma Pavamāna (for Indra)
Gāyatrī (probable)
This Pavamāna Soma hymn celebrates the pressed Soma-drops as they rush through the purifier into the seat of Ṛta (cosmic order), becoming most sweet and luminous for Indra’s strengthening. It describes Soma’s clarification in jars and through the filter, and culminates in a prayer that the purified Indu establish in the worshipper a self-sustaining, thousand-rayed abundance (rayi).
Mantra 1
सोमा असृग्रमिन्दवः सुता ऋतस्य सादने । इन्द्राय मधुमत्तमाः ॥
सोम की बूँदें बह निकली हैं, निचोड़ी गई हैं। वो सचाई के स्थान पर गई हैं। शहद जैसी मीठी हैं, इंद्र की तरफ बढ़ रही हैं। अंदर की रोशनी को मज़बूत करने के लिए।
Mantra 2
अभि विप्रा अनूषत गावो वत्सं न मातरः । इन्द्रं सोमस्य पीतये ॥
रिशियों ने इंद्र को पुकारा है, जैसे सब मिलकर किसी को बुलाएं। रोशनी की किरणें उसके पास आ रही हैं, जैसे माँ अपने बच्चे के पास आती है। यह सब इंद्र के लिए है, क्योंकि वो सोम पी रहे हैं। सोम पीने से वो और तेज हो रहे हैं।
Mantra 3
मदच्युत्क्षेति सादने सिन्धोरूर्मा विपश्चित् । सोमो गौरी अधि श्रितः ॥
सोम उस जगह पर बैठा है जहाँ से वो नहीं हिलता। वो नदी की लहर जैसा है, साफ और समझदार। एक चमकदार चीज़ पर उसने अपना आसरा लिया है जो गौरी के नाम से जानी जाती है।
Mantra 4
दिवो नाभा विचक्षणोऽव्यो वारे महीयते । सोमो यः सुक्रतुः कविः ॥
आसमान के बीच से सोम आ रहा है, जो सबको साफ दिखाता है। एक कपड़े से उसको छानकर साफ किया जा रहा है, और वो बड़ा हो रहा है। यह वो सोम है जो सही काम करता है और सब कुछ जानता है।
Mantra 5
यः सोमः कलशेष्वाँ अन्तः पवित्र आहितः । तमिन्दुः परि षस्वजे ॥
सोम को बर्तन में रख दिया गया है, अंदर की तरफ। एक साफ करने वाली चीज़ में उसको डाला है। चमकदार सोम उसको चारों तरफ से पकड़ के रखता है, ताकि वो साफ रहे।
Mantra 6
प्र वाचमिन्दुरिष्यति समुद्रस्याधि विष्टपि । जिन्वन्कोशं मधुश्चुतम् ॥
चमकदार सोम शब्द भेज रहा है, समुंदर के ऊपर से। वो एक बर्तन को जगा रहा है जिसमें शहद टपक रहा है। इससे बोलने की शक्ति और समझ दोनों बढ़ रही है।
Mantra 7
नित्यस्तोत्रो वनस्पतिर्धीनामन्तः सबर्दुघः । हिन्वानो मानुषा युगा ॥
यह पेड़-पौधों का स्वामी हमेशा लोगों की तारीफ लेता है। यह लोगों के मन में एक ऐसी शक्ति देता है जो बहुत फलदार है। यह इंसान की पूरी ज़िन्दगी को आगे बढ़ाता है। इसकी वजह से इंसान का काम पकने लगता है और उसकी सोच चमकने लगती है।
Mantra 8
अभि प्रिया दिवस्पदा सोमो हिन्वानो अर्षति । विप्रस्य धारया कविः ॥
सोम को आगे बढ़ाया जा रहा है और वो आसमान के प्यारे स्थान की तरफ बह रहा है। यह रिशि जैसी सोच रखता है और अपनी धार से आगे बढ़ता है। उसके पास वो साफ नज़र है जो भगवान दिखाते हैं।
Mantra 9
आ पवमान धारय रयिं सहस्रवर्चसम् । अस्मे इन्दो स्वाभुवम् ॥
हे पवमान, हमारे लिए वो सम्पत्ति ला और उसे बना के रख। वो ऐसी दौलत है जिसमें हज़ार रोशनियाँ हों। हे इन्दु, हमारे अंदर ऐसा कुछ बना दे जो खुद से बना हो और अच्छा हो।
It praises Soma as he is pressed and purified through the filter, becoming sweet and luminous, and then offered toward Indra. It ends by asking Soma to bring radiant prosperity to the worshipper.
It means the purified Soma is aligned with Ṛta—cosmic truth and right order. The offering is not just a drink, but a force that supports harmony and rightful power.
It asks for “wealth/abundance with a thousand lights,” meaning a strong, radiant, many-sided prosperity—outer well-being and inner brightness together.
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