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Sukta 8.39
Agni
This nine-verse hymn praises Agni as the inspired seer and inner messenger who moves between the human and divine assemblies, carrying offerings and bringing the Gods near. It asks Agni to consecrate the worshippers, to empower the rite, and to drive hostile forces away “into another domain.” The hymn culminates in Agni’s cosmic stature—dwelling in the threefold foundations—while invoking him to worship the divine collectives (the Three and the Eleven) and to increase the sacrificers’ strength and prosperity.
Mantra 1
अग्निमस्तोष्यृग्मियमग्निमीळा यजध्यै । अग्निर्देवाँ अनक्तु न उभे हि विदथे कविरन्तश्चरति दूत्यं नभन्तामन्यके समे ॥
मैं अग्नि की बड़ाई करता हूँ, जो यह मंत्र जानता है। मैं अग्नि को पूजा के लिए बुलाता हूँ। अग्नि भगवानों को हमारे पास लाए। वो दोनों जगह जाता है, पैग़ाम ले के। बुरी शक्तियाँ कहीं और जाएँ।
Mantra 2
न्यग्ने नव्यसा वचस्तनूषु शंसमेषाम् । न्यराती रराव्णां विश्वा अर्यो अरातीरितो युच्छन्त्वामुरो नभन्तामन्यके समे ॥
अग्नि, हमारे शरीर में नया शब्द डाल। सच बात बोलो। अंधेरी दुश्मनी को गिरा दो। अच्छी शक्ति बुरी चीज़ें भगा दे। बुरी शक्तियाँ कहीं और जाएँ।
Mantra 3
अग्ने मन्मानि तुभ्यं कं घृतं न जुह्व आसनि । स देवेषु प्र चिकिद्धि त्वं ह्यसि पूर्व्यः शिवो दूतो विवस्वतो नभन्तामन्यके समे ॥
अग्नि, मैं तुम्हे अपने सोच समर्पित करता हूँ। यह मेरा आहुति है। भगवानों के बीच जाग जाओ। तुम पुराना और अच्छा पैग़ंबर हो। बुरी शक्तियाँ कहीं और जाएँ।
Mantra 4
तत्तदग्निर्वयो दधे यथायथा कृपण्यति । ऊर्जाहुतिर्वसूनां शं च योश्च मयो दधे विश्वस्यै देवहूत्यै नभन्तामन्यके समे ॥
अग्नि बार-बार लाइफ की पूर्णता देता है, जैसे किसी की ज़रूरत होती है। वो वसुओं के लिए ताकत का ऑफरिंग है। वो हम में शांति और खुशी भरता है। यह सब देवताओं के लिए है। दुश्मन ताकतें कहीं और भाग जाएँ।
Mantra 5
स चिकेत सहीयसाग्निश्चित्रेण कर्मणा । स होता शश्वतीनां दक्षिणाभिरभीवृत इनोति च प्रतीव्यं नभन्तामन्यके समे ॥
अग्नि बड़ी ताकत से सब जानता है, अपने काम से। वो हमेशा के यज्ञों का पुरोहित है। सही ऑफरिंग के साथ वो आगे बढ़ता है। दुश्मन ताकतें कहीं और भाग जाएँ।
Mantra 6
अग्निर्जाता देवानामग्निर्वेद मर्तानामपीच्यम् । अग्निः स द्रविणोदा अग्निर्द्वारा व्यूर्णुते स्वाहुतो नवीयसा नभन्तामन्यके समे ॥
अग्नि देवताओं में पैदा हुआ। वो इंसानों के अंदर छुपी बात जानता है। वो धन और संपदा देता है। वो दरवाज़े खोलता है, नई ताकत के साथ। दुश्मन ताकतें कहीं और भाग जाएँ।
Mantra 7
अग्निर्देवेषु संवसुः स विक्षु यज्ञियास्वा । स मुदा काव्या पुरु विश्वं भूमेव पुष्यति देवो देवेषु यज्ञियो नभन्तामन्यके समे ॥
अग्नि देवताओं के बीच रहता है, अच्छा इंसान। वो उन खानदानों में आता है जो यज्ञ करते हैं। खुशी और रिशियों के ज्ञान से वो सबको बढ़ता है, जैसे ज़मीन फैली हो। देवताओं में देवता, यज्ञ की ताकत। दुश्मन ताकतें कहीं और भाग जाएँ।
Mantra 8
यो अग्निः सप्तमानुषः श्रितो विश्वेषु सिन्धुषु । तमागन्म त्रिपस्त्यं मन्धातुर्दस्युहन्तममग्निं यज्ञेषु पूर्व्यं नभन्तामन्यके समे ॥
वो अग्नि जो सात रूप वाला है, सारी नदियों में बसा है। हम उसके पास आए हैं। वो तीन शाखाओं वाला है, मांधातर का है, दुश्मनों को मारने वाला, पुराना अग्नि जो यज्ञों में आता है। दुश्मन ताकतें कहीं और भाग जाएँ।
Mantra 9
अग्निस्त्रीणि त्रिधातून्या क्षेति विदथा कविः । स त्रीँरेकादशाँ इह यक्षच्च पिप्रयच्च नो विप्रो दूतः परिष्कृतो नभन्तामन्यके समे ॥
अग्नि एक रिशि है जो तीन जगह रहता है, आसमान, ज़मीन और बीच में। वो सब जगह जानता है। यह अग्नि तीन देवता और ग्यारह और देवताओं की पूजा करता है। वो हमें बरकत दे और हमारा भला करे। वो एक अच्छा दूत है जो सब काम साफ साफ करता है। दुश्मन लोग यहाँ से दूर भाग जाएँ।
It praises Agni as the inner and outer priest who carries offerings to the Gods, brings divine help into the sacrifice, and drives harmful forces away.
Because Agni links the human ritual to the divine world: through the fire, offerings and prayers are conveyed to the Devas, and blessings return to the worshippers.
It refers to traditional groupings of deities invoked in Vedic ritual—Agni is asked to worship these divine collectives on behalf of the sacrificer and to strengthen the community.
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