Sukta 5.85
कितवासो यद्रिरिपुर्न दीवि यद्वा घा सत्यमुत यन्न विद्म । सर्वा ता वि ष्य शिथिरेव देवाधा ते स्याम वरुण प्रियासः ॥
kitavā́so yád riripúr ná dīví yád vā ghā satyám utá yán ná vidmá | sárvā tā́ ví sya śithirá-iva devā́dhā te syāma varuṇa priyā́saḥ ||
भगवान, कभी हमने मस्ती में कुछ गलत कर दिया। कभी दुश्मनी में बुरा बोला। कभी जानके सच काम किया, कभी जानके भी नहीं समझे। यह सब गलतियाँ ऐसे तोड़ दो जैसे कोई धागा ढीला हो। फिर हम तुम्हारे प्यारे बन जाएँ। तुम्हारे साथ सही में रह सकें।
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