यह सोपान ‘भक्ति-पराक्रम’ का द्वार है—जहाँ नाम-स्मरण, विनय, और धर्म-युक्त क्रोध (मर्यादा-रक्षा) एक साथ साधक को ‘अहं-त्याग’ से ‘सेवा-सिद्धि’ तक ले जाते हैं। सुंदरकाण्ड में बाह्य यात्रा (समुद्र-लङ्का) अंतःयात्रा बनती है: संशय → संकल्प → विनय → शरणागति → कृपा-प्राप्ति। प्रस्तुत खण्ड विशेषतः ‘मर्यादा-भंग पर दण्ड’ और ‘विनय न मानने पर भय’ की नीति से साधक को सिखाता है कि ईश्वर-कृपा आलस्य-आश्रित ‘दैव-दैव’ नहीं, पुरुषार्थ-समन्वित शरणागति से प्रकट होती है।
यह खण्ड ‘भक्ति-पराक्रम’ का पाठ है: (1) ‘दैव-दैव’ कहकर आलस्य नहीं—शरणागति के साथ पुरुषार्थ अनिवार्य; लक्ष्मण का संकल्प साधक के भीतर कर्म-शक्ति जगाता है। (2) क्रोध का रूपान्तरण: रौद्र यहाँ अहं-प्रेरित नहीं, मर्यादा-रक्षा हेतु धर्म-नियंत्रित ऊर्जा है। (3) नीति-त्रय (दण्ड–दया–संदेश): भक्ति केवल कोमलता नहीं; अधर्म के प्रति कठोरता, परन्तु सुधार-सम्भावना के प्रति करुणा। (4) अहंकार का पतन-बीज: रावण का दर्प विवेक/नीति को निष्फल करता है—‘अनसुनी’ ही विनाश का द्वार। (5) समुद्र का भयभीत विनय: प्रकृति/परिस्थिति (समुद्र) भी प्रभु-आज्ञा से चलती है; साधक के लिए यह ‘ईश्वर-प्रधानता’ और ‘विनय से मार्ग’ का प्रतीक है—अंततः मार्ग (सेतु/उपाय) कृपा से खुलता है, पर कृपा पुरुषार्थ-संयुक्त विनय पर प्रकट होती है।
चौपाई 51.1-4
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई।करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा।राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा।सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा।दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा।ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई।सिंधु समीप गए रघुराई।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई।बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए।पाछें रावन दूत पठाए।।
sakhā kahī tumha nīki upāī |karia daiva jauṁ hoi sahāī ||
maṁtra na yaha lachimana mana bhāvā |rāma bacana suni ati dukha pāvā ||
nātha daiva kara kavana bharosā |soṣia siṁdhu karia mana rosā ||
kādara mana kahũ eka adhārā |daiva daiva ālasī pukārā ||
sunata bihasi bole raghubīrā |aisehiṁ karaba dharahu mana dhīrā ||
asa kahi prabhu anujahi samujhāī |siṁdhu samīpa gae raghurāī ||
prathama pranāma kīnha siru nāī |baiṭhe puni taṭa darbha ḍasāī ||
jabahiṁ bibhīṣana prabhu pahiṁ āe |pācheṁ rāvana dūta paṭhāe ||
डोस्ट, तुमने अच्छी तरकीब बताई है। अगर किस्मत साथ दे तो हम ट्राय करते हैं। ये बात लक्ष्मन के मन को नहीं भायी। राम के बोल सुनके वो बहुत दुखी हुआ। प्रभु, किस्मत पे क्या भरोसा? मन में गुस्सा करो और समुंदर सूखा दो। किस्मत तो कमजोर मन का आधार होती है। आलसी लोग ही किस्मत किस्मत चिल्लाते हैं। ये सुनके राम मुस्कुराए और बोले, "वैसा ही करेंगे। अपना मन ठीक रखो।" ये कहकर अपने छोटे भाई को समझाया। फिर राम समुंदर के पास गए। पहले सिर झुकार प्रणाम किया। फिर किनारे पर दर्भ घास बिछाकर बैठ गए। जैसे ही विभीषण राम के पास आए, रावन ने उनके पीछे अपने दूत भेज दिए।
दोहा 51
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।
sakala carita tinha dekhe dhareṁ kapaṭa kapi deha |prabhu guna hṛdayã sarāhahiṁ saranāgata para neha ||51||
ये लोग धोखे से बंदर का रूप धर के सब कुछ देख रहे थे. दिल में वो भगवान के गुणों की तारीफ कर रहे थे, और यह भी सोच रहे थे कि भगवान उन पर बहुत मेहरबान हैं जो उसी के आसरे आते हैं.
चौपाई 52.1-4
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ।अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने।सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर।अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए।बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे।दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना।तेहि कोसलाधीस कै आना।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए।दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती।लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
pragaṭa bakhānahiṁ rāma subhāū |ati saprema gā bisari durāū ||
ripu ke dūta kapinha taba jāne |sakala bā̃dhi kapīsa pahiṁ āne ||
kaha sugrīva sunahu saba bānara |aṁga bhaṁga kari paṭhavahu nisicara ||
suni sugrīva bacana kapi dhāe |bā̃dhi kaṭaka cahu pāsa phirāe ||
bahu prakāra mārana kapi lāge |dīna pukārata tadapi na tyāge ||
jo hamāra hara nāsā kānā |tehi kosalādhīsa kai ānā ||
suni lachimana saba nikaṭa bolāe |dayā lāgi hãsi turata choḍāe ||
rāvana kara dījahu yaha pātī |lachimana bacana bācu kulaghātī ||
सब ने खुलके राम के स्वभाव की तारीफ की, और इतने प्यार में डूब गए कि भेजना भूल गए। फिर बंदरों ने उन्हें दुश्मन के जासुस पहचान लिए, सब को बांध कर बंदरों के राजा के पास ले आए। सुग्रीव ने कहा, सुनो सारे बंदर, इन राक्षसों के अंग अंग काट दो और वापस भेज दो। सुग्रीव की बात सुनकर बंदर दौड़ पड़े, उन्हें बांध कर चारों तरफ फौज में घुमाए। बंदर उन्हें तरह तरह से मारने लगे, वो बेचारा चिल्लाते रहे फिर भी छोड़ा नहीं। जिसने हमारी नाक कान काट दिए, उसको कौसल के राजा के आगे आना पड़ेगा। यह सुनकर लक्ष्मण ने सब को पास बुलाया, दया आई और मुस्कुराकर तुरंत छुड़ा दिया। रावण के हाथ में यह चिट्ठी द देना, और उससे कहो, अपने कुल का नाश करने वाले, पढ़, लक्ष्मण क्या कहता है।
दोहा 52
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।
kahehu mukhāgara mūṛha sana mama saṁdesu udāra |sītā dei milehu na ta āvā kāla tumhāra ||52||
उस बेवकूफ को मुँह से ये मेरा खुला संदेश बोलो। सीता को वापस करो और राम से मिलने जाओ। वरना तुम्हारा मरने का वक्त आ गया है।
चौपाई 53.1-4
तुरत नाइ लछिमन पद माथा।चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए।रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता।कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी।जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
करत राज लंका सठ त्यागी।होइहि जब कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई।कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा।भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी।जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
turata nāi lachimana pada māthā |cale dūta baranata guna gāthā ||
kahata rāma jasu laṁkā̃ āe |rāvana carana sīsa tinha nāe ||
bihasi dasānana pū̃chī bātā |kahasi na suka āpani kusalātā ||
puni kahu khabari bibhīṣana kerī |jāhi mṛtyu āī ati nerī ||
karata rāja laṁkā saṭha tyāgī |hoihi jaba kara kīṭa abhāgī ||
puni kahu bhālu kīsa kaṭakāī |kaṭhina kāla prerita cali āī ||
jinha ke jīvana kara rakhavārā |bhayau mṛdula cita siṁdhu bicārā ||
kahu tapasinha kai bāta bahorī |jinha ke hṛdayã trāsa ati morī ||
लक्ष्मण के चरणों में माथा टेकते ही वो लोग तुरंत चले गए, और उसके गुणों की कहानी सुनाते रहे। राम की महिमा गाते हुए वो लंका आ गए, और रावण के चरणों में माथा झुका दिया। रावण हसके पूछा, "बताओ शुक, अपना हाल नही बताओगे?" "फिर विभीषण की खबर बताओ, जिनकी मौत बहुत पास आ गई है।" "बेवकूफ ने लंका का राज छोड दिया, अब वो बदकिस्मत आदमी चक्की के नीचे पिसने वाले अनाज के कीडे जैसा हो जाएगा।" "फिर भालू और बंदर की सेना के बारे में बताओ, जो बुरे वक्त ने यहां भेज दिया है।" "समुद्र भी उनके लिए नरम दिल हो गया, जो उनकी जान का रखवाला बन गया।" "फिर उन रिशियों के बारे में बताओ, जिनके दिल में मुझसे बहुत डर है।"
दोहा 53
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।
kī bhai bheṁṭa ki phiri gae śravana sujasu suni mora |kahasi na ripu dala teja bala bahuta cakita cita tora ||53||
क्या तुम मिला उसे, या बस मेरा नाम सुन के वापस आ गया? दुश्मन की सेना की ताकत और पावर के बारे में क्यों नहीं बता रहे? तेरा दिमाग बहुत परेशान लग रहा है।
चौपाई 54.1-4
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें।मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा।जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना।कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे।राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई।बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी।बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा।सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला।अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
nātha kṛpā kari pū̃chehu jaiseṁ |mānahu kahā krodha taji taiseṁ ||
milā jāi jaba anuja tumhārā |jātahiṁ rāma tilaka tehi sārā ||
rāvana dūta hamahi suni kānā |kapinha bā̃dhi dīnhe dukha nānā ||
śravana nāsikā kāṭai lāge |rāma sapatha dīnhe hama tyāge ||
pū̃chihu nātha rāma kaṭakāī |badana koṭi sata barani na jāī ||
nānā barana bhālu kapi dhārī |bikaṭānana bisāla bhayakārī ||
jehiṁ pura daheu hateu suta torā |sakala kapinha mahã tehi balu thorā ||
amita nāma bhaṭa kaṭhina karālā |amita nāga bala bipula bisālā ||
नाथ, आपने दया करके पूछा है, मैं वही बताता हूँ। गुस्सा छोड़ कर मेरी बात सुन लीजिए। जैसे ही आपका छोटा भाई जाकर मिल गया, राम ने उनके माथे पर तिलक लगाया। बंदर सुन गए कि हम रावन के दूत हैं। उन्होंने हमें बाँध दिया और बहुत तरह के दुख दिए। वो हमारे कान और नाक काटने लगे। हम तब छूटे जब हमने राम की कसम खाई। नाथ, आपने राम की सेना के बारे में पूछा है। सौ करोड़ मुह से भी उसको बताया नही जा सकता। बहुत तरह के रंग के भालू और बंदर हैं। चेहरे खतरनाक हैं, साइज़ बहुत बड़ा है, देख कर डर लगता है। जिसने शहर जलाया और आपका बेटा मारा, उसकी सारे बंदरों में सबसे कम ताकत है। बे-गिनती जाने-माने सिपाही हैं, कठिन और भयंकर। बे-गिनती हाथी जैसी ताकत है, बहुत बड़ा और विशाल।
दोहा 54
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।
dvibida mayaṁda nīla nala aṁgada gada bikaṭāsi |dadhimukha kehari nisaṭha saṭha jāmavaṁta balarāsi ||54||
द्विविद, मैंदा, नील, नल, अंगद, गद, और विकट, यह सब बड़े नाम हैं। दधिमुख, केसरी, निसठ, सठ, जामवंत, यह भी बहुत ताकतवाले हैं।
चौपाई 55.1-4
ए कपि सब सुग्रीव समाना।इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं।तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर।पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं।जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा।आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला।पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा।ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका।मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
e kapi saba sugrīva samānā |inha sama koṭinha ganai ko nānā ||
rāma kṛpā̃ atulita bala tinhahīṁ |tṛna samāna trelokahi ganahīṁ ||
asa maiṁ sunā śravana dasakaṁdhara |paduma aṭhāraha jūthapa baṁdara ||
nātha kaṭaka mahã so kapi nāhīṁ |jo na tumhahi jītai rana māhīṁ ||
parama krodha mījahiṁ saba hāthā |āyasu pai na dehiṁ raghunāthā ||
soṣahiṁ siṁdhu sahita jhaṣa byālā |pūrahīṁ na ta bhari kudhara bisālā ||
mardi garda milavahiṁ dasasīsā |aisei bacana kahahiṁ saba kīsā ||
garjahiṁ tarjahiṁ sahaja asaṁkā |mānahu grasana cahata hahiṁ laṁkā ||
ये सारे बंदर सुग्रीव के लेवल के हैं। इनके जैसे कितने करोड़ हैं, कोई गिन ही नहीं सकता। राम की कृपा से इनमे ऐसी ताकत है जो किसी से कम्पेयर ही नहीं होती। ये तीनों लोक को एक घास की तरह समझते हैं। दस सिर वाले रावण, ये मैंने अपने कानों से सुना है। उस फौज में बंदरों के जो सरदार हैं, वो अठारह पदम तक गिन्ती में हैं। मेरे नाथ, उस फौज में एक ऐसा बंदर भी नहीं है जो तुम्हे रन में हरा न सके। ये सब अपने हाथ मल-मल कर बहुत गुस्से में हैं, पर रघु के नाथ इनको आग्या नहीं दे रहे। ये सागर को मछली और नाग समेत सूखा कर देंगे, या फिर बड़े पहाड़ डाल कर उसे भर देंगे। रावण को कुचल कर मिट्टी में मिला देंगे। सारे बंदर ऐसे ही बातें करते हैं। ये डाडते हैं, गर्राते हैं, अपने आप से बिना किसी डर के। ऐसे लगता है जैसे लंका को निगलना चाहते हैं।
दोहा 55
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।
sahaja sūra kapi bhālu saba puni sira para prabhu rāma |rāvana kāla koṭi kahu jīti sakahiṁ saṁgrāma ||55||
सारे बंदर और भालू अपने आप से ही बहादुर हैं, और उनके सिर पर भगवान राम भी हैं। ऐ रावन, ये लोग लड़ाई में कोटि मौतों को भी हरा सकते हैं।
चौपाई 56.1-5
राम तेज बल बुधि बिपुलाई।सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर।तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं।मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा।जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई।सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई।रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
सचिव सभीत बिभीषन जाकें।बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी।समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
रामानुज दीन्ही यह पाती।नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन।सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
rāma teja bala budhi bipulāī |seṣa sahasa sata sakahiṁ na gāī ||
saka sara eka soṣi sata sāgara |taba bhrātahi pū̃cheu naya nāgara ||
tāsu bacana suni sāgara pāhīṁ |māgata paṁtha kṛpā mana māhīṁ ||
sunata bacana bihasā dasasīsā |jauṁ asi mati sahāya kṛta kīsā ||
sahaja bhīru kara bacana dṛṛhāī |sāgara sana ṭhānī macalāī ||
mūṛha mṛṣā kā karasi baṛāī |ripu bala buddhi thāha maiṁ pāī ||
saciva sabhīta bibhīṣana jākeṁ |bijaya bibhūti kahā̃ jaga tākeṁ ||
suni khala bacana dūta risa bāṛhī |samaya bicāri patrikā kāṛhī ||
rāmānuja dīnhī yaha pātī |nātha bacāi juṛāvahu chātī ||
bihasi bāma kara līnhī rāvana |saciva boli saṭha lāga bacāvana ||
राम के तेज, बल और बुधि कितनी बड़ी है, हज़ारों शेष भी उसे गाकर नहीं थका सकते। एक तीर से वो सौ समंदर सूखा सकता है, फिर भी उसने नीति समझकर अपने भाई से सलाह ली। उसकी बात सुनकर वो समुंदर के पास गया, और दिल मे दया रखते हुए उससे रस्ता मांगा। ये बात सुनकर दस सिर वाले रावन हसा और बोला, अगर उसकी बुधि ऐसी है तो उसने बंदर को अपना साथी बना लिया। जो अपने आप से डरपोक है, उसकी बात पकड़कर उसे मान गया, और बच्चे की तरह ज़िद्द करके समुंदर को मनाने लगा। बेवकूफ, खाली बकवास क्यों कर रहा है? मैने अपने दुश्मन के बल और बुधि की गहराई नाप ली है। जिसका सलाहकार डरपो विभीषन है, उसकी दुनिया मे विजय या कोई नाम कहां है? बुरे आदमी की बात सुनकर दूत का गुस्सा बढ़ा, वक्त देखकर उसने खत निकाला। राम के छोटे भाई ने मुझे ये खत दिया है। मेरे नाथ, इसे पढ़वा लो, ताकि आपके दिल को ठंदक मिले। रावन हसा और उसने खत बाए हाथ से लिया, फिर अपने मंत्री को बुलाकर बेवकूफ ने उसे पढ़वा दिया।
दोहा 56(क)-(ख)
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।
bātanha manahi rijhāi saṭha jani ghālasi kula khīsa |rāma birodha na ubarasi sarana biṣnu aja īsa ||56(ka)||
kī taji māna anuja iva prabhu pada paṁkaja bhṛṁga |hohi ki rāma sarānala khala kula sahita pataṁga ||56(kha)||
ए बेवकूफ, सिर्फ बातों से दिल खुश मत कर और अपना पूरा खानदान तबाह मत कर. राम के दुश्मन बनके तू बच नहीं पाएगा, चाहे तू विष्णु, ब्रह्मा और शिव की शरण में भी चला जाए. या तो अपना घमंड छोड़ दे और अपने छोटे भाई की तरह भगवान के चरण कमल पर भंरा बन जा. या फिर ए मूर्ख, राम के आगी तीर में पतंगा की तरह जलके अपनी पूरी फैमिली के साथ मार जाएगा.
चौपाई 57.1-6
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई।कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा।लघु तापस कर बाग बिलासा।।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी।समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा।नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ।जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही।उर अपराध न एकउ धरिही।।
जनकसुता रघुनाथहि दीजे।एतना कहा मोर प्रभु कीजे।।
जब तेहिं कहा देन बैदेही।चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ।कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई।राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी।राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा।मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
sunata sabhaya mana mukha musukāī |kahata dasānana sabahi sunāī ||
bhūmi parā kara gahata akāsā |laghu tāpasa kara bāga bilāsā ||
kaha suka nātha satya saba bānī |samujhahu chāṛi prakṛti abhimānī ||
sunahu bacana mama parihari krodhā |nātha rāma sana tajahu birodhā ||
ati komala raghubīra subhāū |jadyapi akhila loka kara rāū ||
milata kṛpā tumha para prabhu karihī |ura aparādha na ekau dharihī ||
janakasutā raghunāthahi dīje |etanā kahā mora prabhu kīje ||
jaba tehiṁ kahā dena baidehī |carana prahāra kīnha saṭha tehī ||
nāi carana siru calā so tahā̃ |kṛpāsiṁdhu raghunāyaka jahā̃ ||
kari pranāmu nija kathā sunāī |rāma kṛpā̃ āpani gati pāī ||
riṣi agasti kīṁ sāpa bhavānī |rāchasa bhayau rahā muni gyānī ||
baṁdi rāma pada bārahiṁ bārā |muni nija āśrama kahũ pagu dhārā ||
रवन सब सुन कर अंदर से डर गया, फिर भी होठ पे मुस्कुराया और सबको सुनाते हुए बोला। ज़मीन पे लेटा हुआ हाथ आसमान पकड़ लेगा! छोटे तपस्वी का बस यही खाली बकवास है। शुका ने कहा, प्रभु, इनकी हर बात सच है। ये समझ लो और अपनी घमांड वाली प्रकृति छोड़ दो। अपना गुस्सा छोड़ कर मेरी बात सुनो। प्रभु, राम से दुश्मनी मत रखो। रघुबीर का स्वभाव बहुत नरम है, चाहे वो सारी दुनिया का राजा है। जैसे ही उनसे मिलोगे, भगवान तुम पे कृपा करेंगे, और अपने दिल मे तुम्हारा एक भी गुनाह नही रखेंगे। जनक की बेटी को रघुनाथ को वापस दे दो। इतना ही प्रभु, मेरी बात मान लो। जैसे ही उसने वैदेही वापस करने की बात कही, उस कमेने ने उसपे पैर से मारा। अपना सिर रवन के चरनों से झुका कर, वो वहां चला गया जहां रघुनायक, कृपा का सागर, थे। प्रनाम करके अपनी कहानी सुनाई, और राम की कृपा से अपना पुराना रूप वापस पा गया। भवानी, रिशि अगस्त्य के श्राप से ही वो राक्षस बना था, वरना वो एक ज्ञानी रिशि था। बार बार राम के चरनों को प्रनाम करके, रिशि अपने आश्रम की तरफ चला गया।
दोहा 57
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
binaya na mānata jaladhi jaṛa gae tīna dina bīti |bole rāma sakopa taba bhaya binu hoi na prīti ||57||
समुंदर समझ नही रहा, राम जी ने कितनी रिक्वेस्ट की फिर भी नही सुना। तीन दिन निकल गए। तब राम जी गुस्से में बोले, बिना डर के प्यार नही होता।
चौपाई 58.1-4
लछिमन बान सरासन आनू।सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती।सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी।अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा।ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला।उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने।जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना।बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
lachimana bāna sarāsana ānū |soṣauṁ bāridhi bisikha kṛsānū ||
saṭha sana binaya kuṭila sana prītī |sahaja kṛpana sana suṁdara nītī ||
mamatā rata sana gyāna kahānī |ati lobhī sana birati bakhānī ||
krodhihi sama kāmihi hari kathā |ūsara bīja baẽ phala jathā ||
asa kahi raghupati cāpa caṛhāvā |yaha mata lachimana ke mana bhāvā ||
saṁghāneu prabhu bisikha karālā |uṭhī udadhi ura aṁtara jvālā ||
makara uraga jhaṣa gana akulāne |jarata jaṁtu jalanidhi jaba jāne ||
kanaka thāra bhari mani gana nānā |bipra rūpa āyau taji mānā ||
राम बोले, लक्ष्मन, मेरा धनुष और तीर ले आ। मैं आग वाला तीर मार के समुंदर सूखा दूंगा। मूर्ख से विनय करना, कुटिल से दोस्ती करना, और कंजूस इंसान को अच्छी बातें बताना। ममता में डूबे इंसान को ग्यान की बातें बताना, और बहुत लालच वाले को वैराग्य सिखाना। गुस्से वाले को शांति की बात बताना, और कामी को हरि की कथा सुनाना, यह सब बंजर ज़मीन में बीज बोना जैसा है, कोई फल नहीं मिलता। यह कह के राम ने धनुष पर तीर चढ़ाया, और यह बात लक्ष्मन के दिल को भा गई। प्रभु ने डरावना तीर धनुष पर लगाया, और समुंदर के दिल में आग उठ गई। मगर, नाग, मछली सब परेशान हो गए जब समुंदर को लगा कि उसके जानवर जल रहे हैं। सोने की थाली में बहुत तरह के रतन भरकर वो ब्राह्मण का रूप लेके आ गया, अपना गर्व छोड़कर।
दोहा 58
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
kāṭehiṁ pai kadarī pharai koṭi jatana kou sīṁca |binaya na māna khagesa sunu ḍāṭehiṁ pai nava nīca ||58||
केलिये का पेड़ तभी फल देता है जब उसको काट देते हैं। चाहे कोई करोड़ कोशिश से पानी दे, फल नहीं आता। सुन गरुड़, पक्षियों के राजा, नीच आदमी मिन्नत की बात नहीं मानता। वो सिर्फ तब झुकता है जब डांट लगाया जाए।
चौपाई 59.1-4
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी।इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए।सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई।सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही।मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
sabhaya siṁdhu gahi pada prabhu kere |chamahu nātha saba avaguna mere ||
gagana samīra anala jala dharanī |inha kai nātha sahaja jaṛa karanī ||
tava prerita māyā̃ upajāe |sṛṣṭi hetu saba graṁthani gāe ||
prabhu āyasu jehi kahã jasa ahaī |so tehi bhā̃ti rahe sukha lahaī ||
prabhu bhala kīnhī mohi sikha dīnhī |marajādā puni tumharī kīnhī ||
ḍhola gavā̃ra sūdra pasu nārī |sakala tāṛanā ke adhikārī ||
prabhu pratāpa maiṁ jāba sukhāī |utarihi kaṭaku na mori baṛāī ||
prabhu agyā apela śruti gāī |karauṁ so begi jau tumhahi sohāī ||
समुंदर डर गया और प्रभु के पैर पकड़ लिए। उसने कहा, नाथ, मेरे सारे गलती माफ़ कर दो। आकाश, हवा, आग, पानी और धरती। इन सब का स्वभाव और चलना आपके आगे से ही जादा और सोया हुआ है। आपकी माया ने रचना के लिए इन सब को बनाया है। सारे ग्रंथ यही गाते हैं। प्रभु जिसे जैसा आदेश दे देते हैं, वैसा ही वो रहता है और वैसा ही उसको सुख मिलता है। प्रभु ने अच्छा किया मुझे सबक दी। लेकिन मेरी लिमिट भी आपने ही लगायी थी। ढोल, गवार, शूद्र, जानवर और औरत। ये सब माने के हकदार हैं। प्रभु के बल से मैं सूख जाऊंगा और सेना पार हो जाएगी। लेकिन ये मेरी कोई बड़ाई नहीं है। श्रुत भी यही गाती हैं कि प्रभु का आदेश पलटा नहीं। जो आपको पसंद आए वो मैं तुरंत करूंगा।
दोहा 59
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।
sunata binīta bacana ati kaha kṛpāla musukāi |jehi bidhi utarai kapi kaṭaku tāta so kahahu upāi ||59||
ये बहुत नरम बातें सुन कर, दयालु भगवान मुस्कुराए। फिर बोले, मेरे प्यारे, बताओ कैसे बंदर की सेना पार उतर सकती है।
चौपाई 60.1-4
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई।लरिकाईं रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे।तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई।करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ।जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
एहिं सर मम उत्तर तट बासी।हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा।तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी।हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा।चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
nātha nīla nala kapi dvau bhāī |larikāīṁ riṣi āsiṣa pāī ||
tinha keṁ parasa kieṁ giri bhāre |tarihahiṁ jaladhi pratāpa tumhāre ||
maiṁ puni ura dhari prabhu prabhutāī |karihauṁ bala anumāna sahāī ||
ehi bidhi nātha payodhi baṁdhāia |jehiṁ yaha sujasu loka tihuṁ gāia ||
ehiṁ sara mama uttara taṭa bāsī |hatahu nātha khala nara agha rāsī ||
suni kṛpāla sāgara mana pīrā |turatahiṁ harī rāma ranadhīrā ||
dekhi rāma bala pauruṣa bhārī |haraṣi payonidhi bhayau sukhārī ||
sakala carita kahi prabhuhi sunāvā |carana bandi pāthodhi sidhāvā ||
नाथ, नील और नल दो बंदर भाई हैं। बचपन में इन्हें रिशि का आशीर्वाद मिला था। इनके छूने से बड़े पहाड़ भी समुंदर पार कर लेंगे, आपकी शक्ति से। मैं भी दिल में भगवान की शक्ति रखता हूँ, और जितना मेरा बल है उतना मदद करूँगा। इस तरह नाथ, समुंदर पर सेतु बनवा दो, ताकि ये अच्छा नाम तीनो लोक में गाया जाए। इस बाण से नाथ, मेरे उत्तर किनारे के बुरे आदमियों को मार दो, जो पाप के ढेर हैं। समुंदर की तकलीफ सुनकर, दयालु राम, जो युद्ध में स्थिर हैं, उसे तुरंत दूर कर दिया। राम का बड़ा बल और बहादुरी देखकर, समुंदर खुश हुआ और सुखी हो गया। उसने भगवान को पूरा हिसाब बता दिया, फिर चरण छू कर चला गया।
छंद 60
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
nija bhavana gavaneu sindhu śrīraghupatihi yaha mata bhāyaū |yaha carita kali malahara jathāmati dāsa tulasī gāyaū ||
sukha bhavana saṁsaya samana davana biṣāda raghupati guna ganā |taji sakala āsa bharosa gāvahi sunahi santata saṭha manā ||
समुंदर अपने घर वापस चला गया। राम को ये सलाह पसंद आई। तुलसीदास कहता है, मैंने अपनी समझ के हिसाब से ये कहानी गाई है, और ये कहानी कलि युग की गंदगी मिटा देती है। राम के गुण खुशी का घर हैं, शक को खत्म करते हैं, और दुख दूर करते हैं। ए बेवकूफ दिमाग, हर और उम्मीद और भरोसा छोड़ दे। हमेशा इन गुण को गाता रह और सुनता रह।
दोहा 60
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।
sakala sumaṅgala dāyaka raghunāyaka guna gāna |sādara sunahiṁ te tarahiṁ bhava sindhu binā jalajāna ||60||
राम के गुण गाने से सब तरह के अच्छे फल मिलते हैं। जो लोग दिल से इसको सुनते हैं, उनको इस दुनिया के समंदर से पार लगने के लिए किसी कश्ती की जरूरत नहीं पड़ती।
परम्परा में यह अंश ‘विघ्न-निवारण’ और ‘धैर्य-सिद्धि’ का दायक माना जाता है—विशेषतः जब साधक को कार्य-सिद्धि में विलम्ब, जड़ता, या बाह्य-प्रकृति (परिस्थिति) का ‘उत्तर न देना’ अनुभव हो। ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ का पाठ आत्म-अनुशासन, और ‘सहज जड़ करनी’ का पाठ ईश्वर-आज्ञा-विश्वास दृढ़ करता है।
लोक-परम्परा में संकट/सेतु-कार्य सिद्धि हेतु ‘राम नाम’ का समपुट प्रचलित है—विशेषकर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ का जप-समपुट। (क्षेत्र/सम्प्रदाय के अनुसार भिन्नता मिलती है।)
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.