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यह सोपान ‘अहंकार-लङ्का’ के द्वार पर खड़ा है: जहाँ जीव (रावण-रूप अहं) के सामने भक्ति (अंगद-हनुमत्-पक्ष) नीति, विनय, और निर्भय सत्य बोलकर अंतिम निर्णय कराती है। लंका-काण्ड का आध्यात्मिक प्रवेश-द्वार ‘वैराग्य-युक्त धर्मनीति’ है—दूत-वाक्य के रूप में उपदेश, और प्रत्युत्तर में अहं की ज्वाला।
यह प्रकरण ‘अहंकार-लङ्का’ के द्वार पर दूत-वाक्य की कसौटी है: (1) दूत का निर्भय सत्य = साधक की अंतरात्मा का स्पष्ट विवेक, जो अहं को तर्क-नीति से अंतिम अवसर देता है। (2) ‘दसन गहहु तृन’ जैसी शरणागति-भाषा = अहं के लिए भी मुक्ति-द्वार; विनय को कमजोरी नहीं, धर्म-बल बताया जाता है। (3) रावण का बल-कुल-तप-पूजा-गर्व = आध्यात्मिक उपलब्धियों का अहंकार में विकृत होना; ‘धर्म’ का बाह्य आवरण, भीतर आसक्ति। (4) अंगद का प्रत्युत्तर = भक्ति का निर्णायक तर्क: राम-आश्रय ही परम लाभ; अन्य प्रताप क्षणभंगुर। (5) समग्र प्रतीक: यह संवाद ‘अंतर्मन के युद्ध’ का रूपक है—विवेक (अंगद) बनाम अहं (रावण); निर्णय का क्षण ही लंका-दहन/विनाश की भूमिका है।
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परंपरा में लंका-काण्ड के दूत-संवाद का पाठ ‘भय-निवारण’ और ‘विवेक-जागरण’ का साधन माना जाता है: अहंकार, क्रोध, और वाणी-दोष से बचाकर ‘राम-शरणागति’ की बुद्धि देता है—विशेषतः संकट-काल में निर्भयता और नीति-स्थिरता के लिए।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-जप को समपुट की तरह जोड़ा जाता है; दूत-वाक्य/अभय-प्रसंग पर ‘प्रनतपाल रघुबंसमनि’ (दोहा 20) को भी कई परंपराएँ ‘अभय-समपुट’ की तरह दुहराती हैं।
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