Ayodhya KandaPrakarana 220 Verses

Prakarana 2

यह सोपान ‘धर्म-राज्य’ से ‘धर्म-त्याग’ की ओर अंतर्मुख यात्रा है: समाज-उत्सव (राजतिलक) के बीच ईश्वर-लीला का उलटाव (वनगमन) दिखाकर तुलसी ‘अनुकूल-प्रतिकूल’ दोनों में राम-शरणागति का अभ्यास कराते हैं। यहाँ साधक के लिए मुख्य द्वार है—‘इच्छित सिद्धि’ के क्षण में भी वैराग्य, संयम, और भगवत्-प्रसाद-बुद्धि।

यह प्रकरण ‘धर्म-राज्य’ के बाह्य वैभव को साधना की ‘परीक्षा-भूमि’ बनाता है। अभिषेक-उत्सव आसक्ति/इच्छित-सिद्धि का प्रतीक है—जहाँ मन सहज ही अधिकार, यश, और सुख में टिकना चाहता है; वहीं राम का अंतर्मुख संकोच ‘वैराग्य-शांत’ का संकेत है कि मर्यादा-पुरुषोत्तम के लिए राज्य भी साधन है, साध्य नहीं। देवताओं की योजना ‘लीला’ के दैवी-प्रयोजन को उद्घाटित करती है—व्यक्तिगत सुख के ऊपर लोक-कल्याण/सुरकार्य का विराट विधान। मंथरा ‘वाणी’ के विकार का प्रतीक है: शब्द-रूप विष, जो मंगल को क्षण में अमंगल कर देता है; वह दिखाती है कि अधर्म अक्सर शस्त्र से नहीं, कथा-निर्माण (narrative manipulation), शंका, और तुलना से जन्मता है। कैकेयी के भीतर जागता ‘भय+अहं’ साधक के लिए चेतावनी है—असुरक्षा जब प्रतिष्ठा से जुड़ती है तो विवेक ढक जाता है। समग्र संकेत: अनुकूल में संयम, प्रतिकूल में प्रसाद-बुद्धि, और हर उलटाव में राम-शरणागति।

Verses

चौपाई 10.1-4

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ।बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।

भूप सजेउ अभिषेक समाजू।चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।

राम करहु सब संजम आजू।जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।

गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ।राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।

जनमे एक संग सब भाई।भोजन सयन केलि लरिकाई।।

करनबेध उपबीत बिआहा।संग संग सब भए उछाहा।।

बिमल बंस यहु अनुचित एकू।बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।

प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई।हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।

barani rāma guna sīlu subhāū |bole prema pulaki munirāū ||

bhūpa sajeu abhiṣeka samājū |cāhata dena tumhahi jubarājū ||

rāma karahu saba saṁjama ājū |jauṁ bidhi kusala nibāhai kājū ||

guru sikha dei rāya pahiṁ gayau |rāma hṛdayã asa bisamau bhayaū ||

janame eka saṁga saba bhāī |bhojana sayana keli larikāī ||

karanabedha upabīta biāhā |saṁga saṁga saba bhae uchāhā ||

bimala baṁsa yahu anucita ekū |baṁdhu bihāi baṛehi abhiṣekū ||

prabhu saprema pachitāni suhāī |harau bhagata mana kai kuṭilāī ||

राम के गुन, उसका सीधा स्वभाव और उसकी प्रकृति बता कर, सबसे बड़े रिशि ने बात की, उनके अंदर प्रेम का जोश था। राजा ने राज तिलक की सभा की तैयारी की है, और वो चाहते हैं कि आपको युवराजा बनाया जाए। राम, आज पूरा संयम रखो, ताकि भगवान काम को ठीक से पूरा करें। यह बात बता कर गुरु राजा के पास वापस चले गए। राम के दिल में हैरानी हुई। हम सब भाई एक साथ पैदा हुए थे। बचपन में खाना, सोना, खेलना, सब एक साथ था। कान छेदना, जनेऊ पहनाना और शादी, ये सब खुशियां एक साथ हुई। इस साफ खानदान में एक ही बात ठीक नहीं कि सबसे बड़े भाई को राज तिलक किया जाए, बाकी भाइयों को छोड़ कर। भगवान की प्यारी सी पछतावा बहुत खूबसूरत थी। वो अपने भक्तों के मन की टेड़ापन दूर करे।

दोहा 10

तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।⁠10।।

tehi avasara āe lakhana magana prema ānaṁda |sanamāne priya bacana kahi raghukula kairava caṁda ||⁠10||

उस वक्त लख्मन आ गए, और वो प्रेम और खुशी में मगन थे। राम, जो रघु कुल के कमल के लिए चाँद थे, उन्होंने प्यारे बोलों से उनकी इज्जत की।

चौपाई 11.1-4

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना।पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।

भरत आगमनु सकल मनावहिं।आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।

हाट बाट घर गलीं अथाई।कहहिं परसपर लोग लोगाई।।

कालि लगन भलि केतिक बारा।पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।

कनक सिंघासन सीय समेता।बैठहिं रामु होइ चित चेता।।

सकल कहहिं कब होइहि काली।बिघन मनावहिं देव कुचाली।।

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा।चोरहि चंदिनि राति न भावा।।

सारद बोलि बिनय सुर करहीं।बारहिं बार पाय लै परहीं।।

bājahiṁ bājane bibidha bidhānā |pura pramodu nahiṁ jāi bakhānā ||

bharata āgamanu sakala manāvahiṁ |āvahũ begi nayana phalu pāvahiṁ ||

hāṭa bāṭa ghara galīṁ athāī |kahahiṁ parasapara loga logāī ||

kāli lagana bhali ketika bārā |pūjihi bidhi abhilāṣu hamārā ||

kanaka siṁghāsana sīya sametā |baiṭhahiṁ rāmu hoi cita cetā ||

sakala kahahiṁ kaba hoihi kālī |bighana manāvahiṁ deva kucālī ||

tinhahi sohāi na avadha badhāvā |corahi caṁdini rāti na bhāvā ||

sārada boli binaya sura karahīṁ |bārahiṁ bāra pāya lai parahīṁ ||

हर तरह के बजा बज रहे थे, और शहर की खुशी का बताना मुश्किल था। सब लोग भरत के आने की दुआ कर रहे थे। कहते थे, जल्दी आए, और उनकी आँखों को भी फल मिल जाए। हाट में, सड़क पर, घर में, गली में, और जगह जगह लोग एक दुसरे से कह रहे थे: कल का टाइम अच्छा है। ब्रह्मा हमारी इच्छा पूरी करे, इसमे अभी कितना टाइम लगेगा? राम सीता के साथ सोने के सिंघासन पर बैठेंगे, और हमारा दिल सुकून पाएगा। सब कह रहे थे, कब कल आएगा? पर देवतों का इरादा बुरा था, वो चाहते थे कि रुकावट आ जाए। अयोध्या की खुशी उन्हे पसंद नही आयी, जैसे चांदनी रात चोर को पसंद नही आती। देवतों ने सरस्वती को बुलाया, गुजारिश की, और बार बार उनके पैर पढे।

दोहा 11

बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।⁠11।।

bipati hamāri biloki baṛi mātu karia soi āju |rāmu jāhiṁ bana rāju taji hoi sakala surakāju ||⁠11||

माता, हमारी बड़ी मुसीबत देख कर आज वो काम कर दो जिस्से राम राज छोड़ के बन चले जाए, और भगवान का पूरा काम हो जाए।

चौपाई 12.1-4

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती।भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।

देखि देव पुनि कहहिं निहोरी।मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।

बिसमय हरष रहित रघुराऊ।तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।

जीव करम बस सुख दुख भागी।जाइअ अवध देव हित लागी।।

बार बार गहि चरन सँकोचौ।चली बिचारि बिबुध मति पोची।।

ऊँच निवासु नीचि करतूती।देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।

आगिल काजु बिचारि बहोरी।करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।

हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई।जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।

suni sura binaya ṭhāṛhi pachitātī |bhaiũ saroja bipina himarātī ||

dekhi deva puni kahahiṁ nihorī |mātu tohi nahiṁ thoriu khorī ||

bisamaya haraṣa rahita raghurāū |tumha jānahu saba rāma prabhāū ||

jīva karama basa sukha dukha bhāgī |jāia avadha deva hita lāgī ||

bāra bāra gahi carana sãkocau |calī bicāri bibudha mati pocī ||

ū̃ca nivāsu nīci karatūtī |dekhi na sakahiṁ parāi bibhūtī ||

āgila kāju bicāri bahorī |karahahiṁ cāha kusala kabi morī ||

haraṣi hṛdayã dasaratha pura āī |janu graha dasā dusaha dukhadāī ||

देवतों की गुजारिश सुन के सरस्वती वहीं खड़ी हो गई और उसे बुरा लगा। उसने सोचा, "मैं कमल के फूल के लिए सर्दी की रात बन गई।" उसको झिझकते देख देवतों ने फिर रिक्वेस्ट किया, "माता, आप पर थोड़ी सी भी इल्जाम नहीं आएगी।" "रघुकुल के राजा को ना दुख है ना खुशी। और आप राम की पूरी ताकत जानती हैं।" "हर जीव अपने करम से जुड़ा है और उसी हिसाब से सुख दुख भोगता है। देवतों के फायदे के लिए अयोध्या जाओ।" देवतों ने बार बार उसके चरण पकड़े और जिद की। वो चली गई, सोचते हुए कि देवतों का दिमाग छोटा है। "इनका बसेरा ऊपर है पर इनके काम नीचे के हैं। ये दूसरे की तरक्की बर्दाश्त नहीं कर सकते।" "फिर आगे का काम सोच कर उसने सोचा कि होशियार कवि मेरी बात मानना चाहेंगे।" खुशी से दशरथ की नगर पहुंची, जैसे कोई ग्रह दशा हो जो बर्दाश्त नहीं होती और तकलीफ देती हो।

दोहा 12

नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।⁠12।।

nāmu maṁtharā maṁdamati cerī kaikei keri |ajasa peṭārī tāhi kari gaī girā mati pheri ||⁠12||

उसका नाम मंथरा था। वो कैकेइ की दासी थी, और दिमाग में थोड़ी स्लो थी। सरस्वती ने उसका दिमाग मोद दिया, उसको बुरी रेपुटेशन का डब्बा बना दिया, और फिर चली गयी।

चौपाई 13.1-4

दीख मंथरा नगरु बनावा।मंजुल मंगल बाज बधावा।।

पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू।राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।

करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती।होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।

देखि लागि मधु कुटिल किराती।जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।

भरत मातु पहिं गइ बिलखानी।का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।

ऊतरु देइ न लेइ उसासू।नारि चरित करि ढारइ आँसू।।

हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें।दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।

तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि।छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।

dīkha maṁtharā nagaru banāvā |maṁjula maṁgala bāja badhāvā ||

pūchesi loganha kāha uchāhū |rāma tilaku suni bhā ura dāhū ||

karai bicāru kubuddhi kujātī |hoi akāju kavani bidhi rātī ||

dekhi lāgi madhu kuṭila kirātī |jimi gavã takai leũ kehi bhā̃tī ||

bharata mātu pahiṁ gai bilakhānī |kā anamani hasi kaha hãsi rānī ||

ūtaru dei na lei usāsū |nāri carita kari ḍhārai ā̃sū ||

hãsi kaha rāni gālu baṛa toreṁ |dīnha lakhana sikha asa mana moreṁ ||

tabahũ na bola ceri baṛi pāpini |chāṛai svāsa kāri janu sā̃pini ||

मंथरा ने देखा शहर सजा हुआ है। हर तरफ खूबसूरत धुन और खुशी के गाने बज रहे हैं। उसने लोगों से पूछा कि ये खुशी किस लिए है। जब उसने सुना कि राम का राज तिलक होगा, तो उसके दिल में आग लग गई। वो बुरे दिल की, नीची जात की औरत सोचने लगी कि रात निकलने से पहले सब कैसे खराब हो जाए। वो उस चलक किरात औरत जैसी हो गई जो पेड़ पर लटक रहे शहद के छते को देख कर सोचती है कि इसे कैसे पकड़ लूँ। वो रोते हुए भरत की माता के पास गई। रानी मुस्कुरई और बोली, तुम इतनी परेशान क्यों हो? मंथरा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस लंबी साँसें ली, और औरत की चाल से आँसू बहाने लगी। रानी हस कर बोली, तुम्हारा बड़ा तेज जबान है। मुझे लगता है लक्ष्मण ने तुम्हें सबक सिखा दिया है। तब भी वो पापी दासी कुछ नहीं बोली, बस काली नागिन की तरह साँसें छोड़ती रही।

दोहा 13

सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।⁠13।।

sabhaya rāni kaha kahasi kina kusala rāmu mahipālu |lakhanu bharatu ripudamanu suni bhā kubarī ura sālu ||⁠13||

रानी डर में बोली, मुझे क्यों नहीं बता रहे, राम और राजा ठीक हैं या नहीं? और लखन, भरत और शत्रुघ्न कैसे हैं? ये सुन के कुबड़ी के दिल में तीर लगा।

चौपाई 14.1-4

कत सिख देइ हमहि कोउ माई।गालु करब केहि कर बलु पाई।।

रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू।जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन।देखत गरब रहत उर नाहिन।।

देखेहु कस न जाइ सब सोभा।जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें।जानति हहु बस नाहु हमारें।।

नीद बहुत प्रिय सेज तुराई।लखहु न भूप कपट चतुराई।।

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी।झुकी रानि अब रहु अरगानी।।

पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी।तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।

kata sikha dei hamahi kou māī |gālu karaba kehi kara balu pāī ||

rāmahi chāṛi kusala kehi ājū |jehi janesu dei jubarājū ||

bhayau kausilahi bidhi ati dāhina |dekhata garaba rahata ura nāhina ||

dekhehu kasa na jāi saba sobhā |jo avaloki mora manu chobhā ||

pūtu bidesa na socu tumhāreṁ |jānati hahu basa nāhu hamāreṁ ||

nīda bahuta priya seja turāī |lakhahu na bhūpa kapaṭa caturāī ||

suni priya bacana malina manu jānī |jhukī rāni aba rahu aragānī ||

puni asa kabahũ kahasi gharaphorī |taba dhari jībha kaṛhāvaũ torī ||

माँ, कोई मुझे सलाह क्यों देगा? किसके बल पर मैं किसी से लड़ूँगी? आज राम के अलावा कौन खुश है, जिसे राजा युवराज बना रहे हैं? कौसल्या की किस्मत बहुत अच्छी हो गई है। उसको देख कर किसी के दिल में गर्व नहीं बचा। तुम क्यों नहीं जाकर देखती वो सारी सोभा, जिसे देख कर मेरा दिल परेशान होता है? तुम्हारा बेटा परदेस में है और तुम्हें कोई फिकर नहीं। तुम समझती हो के तुम्हारा पति तुम्हारे कंट्रोल में है। तुमको नींद बहुत प्यारी है, और सेज और कंबल। तुम राजा के धोखे और चाल को नहीं देखती। ये बातें सुन कर जो प्यारी लग रही थी, पर उसका दिल खराब जान कर, रानी ने उसको डाँटा: अब चुप रहो, बक-बक करने वाली। अगर तुमने कभी फिर ऐसे बोला, घर तोड़ने वाली, तो मैं तुम्हारी जीभ पकड़ कर निकालवा दूँगी।

दोहा 14

काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।⁠14।।

kāne khore kūbare kuṭila kucālī jāni |tiya biseṣi puni ceri kahi bharatamātu musukāni ||⁠14||

भरत की माँ ने मुस्कुरा के बोला। उसे पता था कि काना, लंगड़ा और कुबड़ा लोग टेढ़े और बुरे होते हैं। औरत तो और भी ज्यादा ऐसी होती है। और नौकरानी हो तो उससे भी बढ़कर। ये सब जान के वो मुस्कुराई और बोली।

चौपाई 15.1-4

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही।सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।

सुदिनु सुमंगल दायकु सोई।तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई।यह दिनकर कुल रीति सुहाई।।

राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली।देउँ मागु मन भावत आली।।

कौसल्या सम सब महतारी।रामहि सहज सुभायँ पिआरी।।

मो पर करहिं सनेहु बिसेषी।मैं करि प्रीति परीछा देखी।।

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू।होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।।

प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें।तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।

priyabādini sikha dīnhiũ tohī |sapanehũ to para kopu na mohī ||

sudinu sumaṁgala dāyaku soī |tora kahā phura jehi dina hoī ||

jeṭha svāmi sevaka laghu bhāī |yaha dinakara kula rīti suhāī ||

rāma tilaku jauṁ sā̃cehũ kālī |deũ māgu mana bhāvata ālī ||

kausalyā sama saba mahatārī |rāmahi sahaja subhāyã piārī ||

mo para karahiṁ sanehu biseṣī |maiṁ kari prīti parīchā dekhī ||

jauṁ bidhi janamu dei kari chohū |hohũ rāma siya pūta putohū ||

prāna teṁ adhika rāmu priya moreṁ |tinha keṁ tilaka chobhu kasa toreṁ ||

तुम इतनी मीठी बात कर रही हो, मैंने तुम्हे यह सलाह दी है. मुझे तुम पे कोई गुस्सा नहीं है, सपने में भी नहीं. वही दिन सबसे अच्छा और मंगलमयी है जिस दिन तुम्हारी बात सच हो जाए. बड़ा भाई स्वामी होता है और छोटे भाई सेवक. यह सूर्य वंश की खूबसूरत रीति है. अगर राम का राज तिलक सच में कल हो, तो मुझसे मांगो साहिबा जो तुम्हारे दिल को भाए, मैं दे दूंगी. सब मायें राम को कौसल्या जैसी ही लगती हैं, और वो सबसे नैचुरली प्यार करता है. मुझ पे वो खास प्यार करता है. मैंने उसकी प्रीत को देखा और परखी है. अगर विधाता दया करके दूसरा जन्म दे, तो राम और सीता मेरे बेटा और बहू बनें. राम मुझे मेरे प्राण से भी ज्यादा प्यारे हैं. तो फिर उनका तिलक तुम्हें इतनी चिंता क्यों दे रहा है?

दोहा 15

भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।⁠15।।

bharata sapatha tohi satya kahu parihari kapaṭa durāu |haraṣa samaya bisamau karasi kārana mohi sunāu ||⁠15||

मैं भरत की कसम खाता हूँ, मुझे सच बताओ। झूठ मत बोलो और कुछ छुपाना बंद करो। खुशी का वक्त है और तुम उदास हो। मुझे बताओ क्यों।

चौपाई 16.1-4

एकहिं बार आस सब पूजी।अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।

फोरै जोगु कपारु अभागा।भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।।

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई।ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।।

हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती।नाहिं त मौन रहब दिनु राती।।

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा।बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।।

कोउ नृप होउ हमहि का हानी।चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।

जारै जोगु सुभाउ हमारा।अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।।

तातें कछुक बात अनुसारी।छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।

ekahiṁ bāra āsa saba pūjī |aba kachu kahaba jībha kari dūjī ||

phorai jogu kapāru abhāgā |bhaleu kahata dukha raurehi lāgā ||

kahahiṁ jhūṭhi phuri bāta banāī |te priya tumhahi karui maiṁ māī ||

hamahũ kahabi aba ṭhakurasohātī |nāhiṁ ta mauna rahaba dinu rātī ||

kari kurūpa bidhi parabasa kīnhā |bavā so lunia lahia jo dīnhā ||

kou nṛpa hou hamahi kā hānī |ceri chāṛi aba hoba ki rānī ||

jārai jogu subhāu hamārā |anabhala dekhi na jāi tumhārā ||

tāteṁ kachuka bāta anusārī |chamia debi baṛi cūka hamārī ||

मेरे सारे काम एक ही बार में हो गए। अब अगर मैं बोलुंगी तो ऐसा लगेगा जैसे दूसरी जीब से बोल रही हूँ। मेरे मनहूस सर को टूटा जाना चाहिए। मैं जो अच्छी बात भी करती हूँ, आपको ही बुरा लगता है। जो लोग झूठ घड़के सच बोलते हैं, वो आपको प्यारे लगते हैं मा, और मैं आपको कड़वी लगती हूँ। अब से मैं भी सिर्फ ठाकुर को खुश करने की बात बोलुंगी, वरना दिन रात चुप रहुंगी। किस्मत ने मुझे बुरा बना के दूसरों के भरोसे छोड़ दिया। जो बोया वही काटा, जो दिया वही मिला। कोई भी राजा बन जाए, मेरा क्या जाता है? मैं दासी बनकर रानी बन जाऊंगी क्या? मेरा स्वभाव जल जाना चाहिए। मैं आपका कोई नुकसान देख नहीं सकता। इसलिए मैं थोड़ी सी बात जो ठीक थी वो बोली। माफ कर दो देवी, मेरी बहुत बड़ी गलती है।

दोहा 16

गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।⁠16।।

gūṛha kapaṭa priya bacana suni tīya adharabudhi rāni |suramāyā basa bairinihi suhda jāni patiāni ||⁠16||

रानी ने प्यारे प्यारे बात सुनी, पर उन बातों के अंदर बहुत गहरा धोखा छुपा था। रानी का दिमाग हल्का था। देवताओं की माया के नीचे आ गई। अपने दुश्मन को सच्चा दोस्त समझ लिया, और उस पर भरोसा कर लिया।

चौपाई 17.1-4

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही।सबरी गान मृगी जनु मोही।।

तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी।रहसी चेरि घात जनु फाबी।।

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ।धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।

सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली।अवध साढ़साती तब बोली।।

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी।रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।।

रहा प्रथम अब ते दिन बीते।समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।।

भानु कमल कुल पोषनिहारा।बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।।

जरि तुम्हारि चह सवति उखारी।रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।

sādara puni puni pū̃chati ohī |sabarī gāna mṛgī janu mohī ||

tasi mati phirī ahai jasi bhābī |rahasī ceri ghāta janu phābī ||

tumha pū̃chahu maiṁ kahata ḍerāū̃ |dhareu mora gharaphorī nāū̃ ||

saji pratīti bahubidhi gaṛhi cholī |avadha sāṛhasātī taba bolī ||

priya siya rāmu kahā tumha rānī |rāmahi tumha priya so phuri bānī ||

rahā prathama aba te dina bīte |samau phireṁ ripu hohiṁ piṁrīte ||

bhānu kamala kula poṣanihārā |binu jala jāri karai soi chārā ||

jari tumhāri caha savati ukhārī |rū̃dhahu kari upāu bara bārī ||

वो उससे बार बार इज्जत से पूछती रही, जैसे हिरन शिकारी के गाने से जादू में आ जाए। कैकेई का दिमाग वैसे ही पलट गया जैसे भगवान की मर्जी थी, और दासी खुश हो गई, जैसे उसका तीर निशाना लग गया। "तुम पूछती हो पर मुझे बोलने से डर लगता है, मुझे घर तोड़ने वाली का नाम मिल चुका है।" बहुत तरह से भरोसा दिलाकर और बात बनाकर, अयोध्या की शनि ने बोला। "हे रानी, तुमने कहा कि सीता और राम तुम्हे प्यारे हैं, और सच में राम तुम्हे प्यारा है।" "पहले ऐसा था, अब वो दिन बीत गए। जब वक्त बदलता है तो प्यारे लोग भी दुश्मन बन जाते हैं।" "सूरज कमल को पाल पोस कर दिखाता है, पर पानी ना हो तो वही सूरज उसे राख कर देता है।" "तुम्हारी सौतन तुम्हारे जड़ उखाड़ कर जलाना चाहती है। कोई उपाय करके अपने अच्छे बाग को बचाओ।"

दोहा 17

तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।⁠17।।

tumhahi na socu sohāga bala nija basa jānahu rāu |mana malīna muha mīṭha nṛpa rāura sarala subhāu ||⁠17||

तुम अपने पति के प्यार पे भरोसा करके और राजा को अपने कंट्रोल में समझ कर कोई टेंशन नहीं ले रही हो। लेकिन राजा के मन में खराब सोच है और मुह से सिर्फ मीठी बात बोलते हैं, जबकि तुम्हारा स्वभाव सीधा और बिना चल है।

चौपाई 18.1-4

चतुर गँभीर राम महतारी।बीचु पाइ निज बात सँवारी।।

पठए भरतु भूप ननिअउरें।राम मातु मत जानव रउरें।।

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें।गरबित भरत मातु बल पी कें।।

सालु तुम्हार कौसिलहि माई।कपट चतुर नहिं होइ जनाई।।

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी।सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।।

रची प्रंपचु भूपहि अपनाई।राम तिलक हित लगन धराई।।

यह कुल उचित राम कहुँ टीका।सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।।

आगिलि बात समुझि डरु मोही।देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।

catura gãbhīra rāma mahatārī |bīcu pāi nija bāta sãvārī ||

paṭhae bharatu bhūpa naniaureṁ |rāma mātu mata jānava raureṁ ||

sevahiṁ sakala savati mohi nīkeṁ |garabita bharata mātu bala pī keṁ ||

sālu tumhāra kausilahi māī |kapaṭa catura nahiṁ hoi janāī ||

rājahi tumha para premu biseṣī |savati subhāu sakai nahiṁ dekhī ||

racī praṁpacu bhūpahi apanāī |rāma tilaka hita lagana dharāī ||

yaha kula ucita rāma kahũ ṭīkā |sabahi sohāi mohi suṭhi nīkā ||

āgili bāta samujhi ḍaru mohī |deu daiu phiri so phalu ohī ||

राम की माता बहुत चतुर और गहरी है। अपना मौका देख कर अपने काम ठीक कर लिए हैं। राजा ने भरत को नाना के घर भेजा था। समझो ये राम की माता के सलाह से हुआ। उसने कहा कि सारी सौतें मुझसे अच्छी सेवा करती हैं। बस भरत की माता अपने पति के बल पर गर्व करती है। तुम माता कौसल्या के लिए कांट हो। पर वो चाल में चतुर है, इसलिए दिखलाती नहीं। राजा को तुमसे खास प्यार है, और सौतन की फितरत की वजह से वो ये बर्दाश्त नहीं कर पाती। उसने प्लान बनाया, राजा को मनाया, और राम के तिलक की तारीख फिक्स करवा दी। राम का तिलक हमारे खानदान के लिए ठीक है। सब को पसंद आता है, मुझे भी बहुत अच्छा लगता है। पर आगे की बात सोच कर मुझे डर लगता है। भगवान उसका फल उसके सिर पर वापस दे।

दोहा 18

रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।⁠18।।

raci paci koṭika kuṭilapana kīnhesi kapaṭa prabodhu |kahisi kathā sata savati kai jehi bidhi bāṛha birodhu ||⁠18||

उसने लाखों तरीके से चाल और कपड़ पकड़ी। उसने कैकेयी को धोखे वाली सलाह दी। उसने सौतेली पत्नियों की कई कहानियां सुनाई, ऐसे तरीके से कि कैकेयी का गुस्सा बढ़े।

चौपाई 19.1-4

भावी बस प्रतीति उर आई।पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।

का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना।निज हित अनहित पसु पहिचाना।।

भयउ पाखु दिन सजत समाजू।तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।।

खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें।सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।।

जौं असत्य कछु कहब बनाई।तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।।

रामहि तिलक कालि जौं भयऊ।तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।।

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी।भामिनि भइहु दूध कइ माखी।।

जौं सुत सहित करहु सेवकाई।तौ घर रहहु न आन उपाई।।

bhāvī basa pratīti ura āī |pū̃cha rāni puni sapatha devāī ||

kā pūchahũ tumha abahũ na jānā |nija hita anahita pasu pahicānā ||

bhayau pākhu dina sajata samājū |tumha pāī sudhi mohi sana ājū ||

khāia pahiria rāja tumhāreṁ |satya kaheṁ nahiṁ doṣu hamāreṁ ||

jauṁ asatya kachu kahaba banāī |tau bidhi deihi hamahi sajāī ||

rāmahi tilaka kāli jauṁ bhayaū |tumha kahũ bipati bīju bidhi bayaū ||

rekha khãcāi kahaũ balu bhāṣī |bhāmini bhaihu dūdha kai mākhī ||

jauṁ suta sahita karahu sevakāī |tau ghara rahahu na āna upāī ||

रानी को दिल से उसकी बात मान आई। उसने उससे कसम दिलाई और फिर से सब कुछ बताने को कहा। और क्या पूछूँगी? अभी तक तुम नहीं समझे। जानवर भी जानते हैं कि उन्हें क्या अच्छा है और क्या बुरा। पंद्रह दिन से तैयारियाँ चल रही हैं, और आज तुम्हें मुझसे पता चला। मैं तुम्हारे रूल से खाती पहनती हूँ। सच बोलने में मेरा कोई दोष नहीं है। अगर मैं कुछ झूठ घड़के बता दूँ, तो भगवान मुझे सजा दे। अगर कल राम का तिलक हो गया, तो समझ लो कि तकदीर ने तुम्हारे लिए मुसीबत का बीज बोया है। मैं ज़मीन पर लाइन खींच कर पूरे ज़ोर से कह रही हूँ। तुम दूध की मक्खी बन जाओगी। अगर तुम और तुम्हारा बेटा सेवक की तरह रहने को तैयार हो, तो इस घर में रह सकती हो। और कोई रास्ता नहीं है।

दोहा 19

कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।⁠19।।

kadrū̃ binatahi dīnha dukhu tumhahi kausilā̃ deba |bharatu baṁdigṛha seihahiṁ lakhanu rāma ke neba ||⁠19||

जैसे कद्रू ने विनता को दुख दिया था, वैसे कौसल्या भी तुम्हे दुख देगी। भरत को जेल में रहना पड़ेगा, और लखन राम का सेवक बनेगा।

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता में अयोध्या काण्ड के इन प्रसंगों का पाठ ‘विवेक-जागरण’ कराता है: मंथरा-कपट और देव-प्रपंच के बीच भी राम-धर्म की स्मृति दृढ़ होती है, गृहस्थ-जीवन में ईर्ष्या/भय से बचने की बुद्धि मिलती है, और ‘प्रसाद-बुद्धि’ (जो हो, राम-इच्छा) का संस्कार बढ़ता है।

सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-स्मरण को संपुट रूप में रखा जाता है; कुछ परंपराएँ संकट-निवारण हेतु ‘रामचरितमानस’ के प्रसंग-पाठ के साथ ‘हनुमान चालीसा’/‘राम रक्षा स्तोत्र’ जोड़ती हैं, पर यह स्थानीय आचार पर निर्भर है।

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