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यह सोपान ‘धर्म-राज्य’ से ‘धर्म-त्याग’ की ओर अंतर्मुख यात्रा है: समाज-उत्सव (राजतिलक) के बीच ईश्वर-लीला का उलटाव (वनगमन) दिखाकर तुलसी ‘अनुकूल-प्रतिकूल’ दोनों में राम-शरणागति का अभ्यास कराते हैं। यहाँ साधक के लिए मुख्य द्वार है—‘इच्छित सिद्धि’ के क्षण में भी वैराग्य, संयम, और भगवत्-प्रसाद-बुद्धि।
यह प्रकरण ‘धर्म-राज्य’ के बाह्य वैभव को साधना की ‘परीक्षा-भूमि’ बनाता है। अभिषेक-उत्सव आसक्ति/इच्छित-सिद्धि का प्रतीक है—जहाँ मन सहज ही अधिकार, यश, और सुख में टिकना चाहता है; वहीं राम का अंतर्मुख संकोच ‘वैराग्य-शांत’ का संकेत है कि मर्यादा-पुरुषोत्तम के लिए राज्य भी साधन है, साध्य नहीं। देवताओं की योजना ‘लीला’ के दैवी-प्रयोजन को उद्घाटित करती है—व्यक्तिगत सुख के ऊपर लोक-कल्याण/सुरकार्य का विराट विधान। मंथरा ‘वाणी’ के विकार का प्रतीक है: शब्द-रूप विष, जो मंगल को क्षण में अमंगल कर देता है; वह दिखाती है कि अधर्म अक्सर शस्त्र से नहीं, कथा-निर्माण (narrative manipulation), शंका, और तुलना से जन्मता है। कैकेयी के भीतर जागता ‘भय+अहं’ साधक के लिए चेतावनी है—असुरक्षा जब प्रतिष्ठा से जुड़ती है तो विवेक ढक जाता है। समग्र संकेत: अनुकूल में संयम, प्रतिकूल में प्रसाद-बुद्धि, और हर उलटाव में राम-शरणागति।
Verse 21 (चौपाई)
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।। भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।। राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।। गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।। जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।। करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।। बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।। प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।
मुनि राजा ने राम के गुण और अच्छा स्वभाव बताना शुरू किया। वो प्रेम से भरा हुआ था, उनका बदन कमक रहा था। राजा ने अभिषेक की तैयारी कर दी थी। वो चाहते थे कि तुम्हे राजकुमार बनाया जाए। राम, आज सारी तैयारी कर लो ताकि काम सही से हो जाए। गुरु ने सिखा दिया और राजा के पास चले गए। राम के दिल में अच्छा नहीं लगा। सारे भाई साथ में पैदा हुए। साथ में खाना खाया, साथ में सोए, साथ में खेला। साथ में कान चेदवाए, साथ में जनेउ पहना, साथ में शादी हुई। सब खुश थे। इस खानदान में एक बात ठीक नहीं है। बड़ा भाई छोड़ के छोटे भाई को राज्य मिल रहा है। भगवान ज़रूर पछताएंगे। वो अपने भक्त के दिल से बुरी बात हटा देंगे।
Verse 22 (दोहा/सोरठा)
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद। सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।
उस वक्त लक्ष्मण आया। वो प्रेम और खुशी से भरा हुआ था। उसने रघुकुल के चाँद, यानी राम, को अच्छी बातें बोली और उनकी खुशी मनायी।
Verse 23 (चौपाई)
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।। भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।। हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।। कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।। कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।। सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।। तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।। सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।
बहुत सारे बाजा बज रहे थे। शहर में इतनी खुशी थी कि बता नहीं सकते। सब भरत के आने की खुशी मना रहे थे। लोग बोल रहे थे, जल्दी आओ, तुम्हारी आँखें फल पाएँ। हाट, बाट, घर, गली में सब लोग एक दूसरे से बात कर रहे थे। आज अच्छा वक्त है, हमने कितनी बार पूजा की थी कि हमारी इच्छा पूरी हो। राम सीता के साथ सोना सिंहासन पर बैठेंगे, हमारा दिल खुश हो जाएगा। सब पूछ रहे थे कि कब वक्त आएगा। वो देवताओं से विघ्न दूर करने को कह रहे थे। पर उन्हें अयोध्या की साजवाट अच्छी नहीं लग रही थी। चाँदनी रात भी उन्हें पसंद नहीं आई। वो देवताओं से बिनया कर रहे थे, बार बार उनके पाँव पकड़ रहे थे।
Verse 24 (दोहा/सोरठा)
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु। रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।
माँ, हमारी बड़ी मुसीबत देख कर आज वो करो जो सही है। राम राज्य छोड़ के जंगल जाएँ। इससे देवताओं का काम हो जाएगा।
Verse 25 (चौपाई)
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।। देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।। बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।। जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।। बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।। ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।। आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।। हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।
देवताओं की बात सुन कर वो खड़ी हो गई और पछताने लगी। वो एक कमल के फूल जैसी थी जो ठंड में फंस गई हो। देवताओं ने फिर से नरमी से कहा, माँ, हमने तुमसे छोटी बात नहीं कही। रघुकुल के राजा को न कोई हैरानी थी न खुशी। उन्होंने कहा, तुम राम की शक्ति को जानते हो। जीव अपने करम के कारण सुख दुख पाता है। चलो अयोध्या चलते हैं, देवताओं के भले के लिए। वो बार बार चरण पकड़ कर शरम से चली गई। उसका घर ऊँचा है पर काम नीचा है। वो दूसरों की महिमा नहीं देख सकते। अगला काम सोच कर वो फिर से मेरा भला करेंगे। वो खुशी से दशरथ की नगर आई, जैसे कोई ग्रह दुख देने आया हो।
Verse 26 (दोहा/सोरठा)
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि। अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।
उसका नाम मंथरा था। वो कैकेई की दासी थी, और दिमाग में थोड़ी कमज़ोर थी। वो पाप भरने वाली बनती गई। उसकी बातें और सोच, दोनों टेढ़ी हो गई।
Verse 27 (चौपाई)
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।। पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।। करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।। देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।। भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।। ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।। हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।। तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।
मंथरा ने देखा कि शहर सजाया गया है। मंगल के ढोल और बाजे बज रहे हैं। उसने लोगों से पूछा कि इतना शोर क्यों है। जब उसने सुना कि राम का राज्याभिषेक हो रहा है, उसका दिल जलने लगा। वो बुरी औरत सोचने लगी कि अब क्या बुरा होगा और कैसे होगा। सजावट देख के उसकी बुरी नज़र और भी बढ़ गई। वो सोचने लगी कि कैसे इसे रोका जाए। वो भरत की माँ के पास गई और रोने लगी। उसने पूछा कि आप क्यों मुस्कुरा रही हैं, रानी साहिबा बोलो ना। रानी ने जवाब नहीं दिया, बस आँसू बहाने लगी। अपनी बात करने का नाटक किया। रानी हस के बोली कि तुम मेरी डाँट रहे हो, लक्ष्मण ने मुझे ऐसा समझाया है। फिर भी वो दासी नहीं बोली, बहुत बुरी औरत थी। उसने साँस छोड़ी जैसे साँप करता है।
Verse 28 (दोहा/सोरठा)
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु। लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।
रानी ने शरम से कहा कि आप राम के बारे में क्यों पूछ रहे हो, राजा साहब। लक्ष्मण, भरत और शत्रु मिटाने वाले राम की बात सुन के रानी के दिल में दर्द हुआ।
Verse 29 (चौपाई)
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।। रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।। भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।। देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।। पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।। नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।। सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।। पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।
कौशल्या बोली कि माँ, मुझे कौन ऐसी बात समझा रहा है। मेरी हिम्मत कहाँ है कि मैं किसी को डाँट सकूँ। आज राम के बिना और क्या अच्छा है? जिसके कारण युवराज का पद मिलता है। कौशल्या अपनी किस्मत से बहुत दुखी हो गई। अपना गर्व देख के उसके दिल में शांति नहीं थी। देखो यह सारी शोभा कैसे नहीं रहेगी, जो देख के मेरा मन खुश हुआ था। तुम्हारा बेटा देश छोड़ के जाएगा, तुम मत दुख हो। मैं जानती हूँ कि मेरा कोई आसरा नहीं है। अपनी प्यारी बिस्तर पर सोते रहो, राजा की चालाकी मत देखो। उसकी प्यारी बातें सुन के उसका मन दुखी है, रानी झुक गई और चुप हो गई। फिर तुम ऐसी बात करती हो, घर तोड़ने वाली, तब मैं तुम्हे जीभ दिखाऊँगा।
Verse 30 (दोहा/सोरठा)
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।
मंथरा का एक कान खराब था, वो कुबड़ी थी, और उसकी हरकतें टेढ़ी थी। यह सब जानके भी भरत की माँ मुस्कुरा के उससे बात करती थी, जैसे वो उसकी प्यारी हो।
Verse 31 (चौपाई)
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।। सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।। जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।। राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।। कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।। मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।। जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।। प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।
मैंने तुम्हे अच्छी समझदारी दी है, प्यार से बात करने वाली। कभी किसी पे गुस्सा नहीं करती, सपने में भी नहीं। वो दिन ही अच्छा दिन है जब तुम्हारी बात पूरी होती है। जिस दिन तुम्हारा काम हो, उस दिन शुभ होता है। स्वामी बड़ा होता है, नौकर छोटा, यह सूर्यवंश की पुरानी रिवाज है। अगर राम का राज तिलक पक्का है, तो मैं अपना मन माँगी दुआ माँगूँगी। कौशल्या जैसी है मेरे लिए कैकेयी, और राम मुझे अपने आप से प्यारा है। वो मुझपे खास प्यार रखते हैं, मैंने उनकी अटैचमेंट टेस्ट करके देखी है। अगर भगवान मुझे जनम जनम दे, तो मैं राम और सीता की सेवक बनूँगी। राम मुझे जान से भी प्यारे हैं, उनका तिलक कैसे तोड़ूँ मैं साँस नहीं ले पाऊँगी।
Verse 32 (दोहा/सोरठा)
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ। हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।
भरत की कसम, तुम सच बोलो। झूठ और छुपाना छोड़ दो। तुम मुसीबत के वक्त खुश हो रहे हो, मुझे बताओ क्यों।
Verse 33 (चौपाई)
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।। फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।। कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।। हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।। करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।। कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।। जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।। तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।
मैंने सिर्फ तुमपे भरोसा किया था, अब मैं दूसरी तरह से बात करूँगी। जिसका किस्मत में सर फटना है, वो जब भी अच्छी बात करता है खुद को दुख पहुँचाता है। लोग झूठी बातें घड़े हैं, माँ यह बातें तुम्हे दुख देंगे। मैं भी घर की औरत की तरह बात करूँगी, या फिर दिन रात चुप रहूँगी। भगवान ने मुझे बुरा बनाया, जो मैंने बोया वो कटेगा। कोई और राजा बने तो मेरा क्या जाता? नौकरी करके अब रानी बनूँगी क्या? मेरा स्वभाव ही ऐसा है कि ताकत बर्बाद करता है, तुम्हारा बुरा स्वभाव दिखता नहीं। इसलिए मेरा छोटा सा गलती माफ़ करो, मैंने बड़ा गलती की है देवी।
Verse 34 (दोहा/सोरठा)
गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।
उसने प्यार से झूठी बातें सुनाई, रानी समझ में छोटी थी। दुश्मन को दोस्त समझ के भरोसा कर लिया, भगवान की माया में थी।
Verse 35 (चौपाई)
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।। तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।। तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।। सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।। प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।। रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।। भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।। जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।
वो बार बार इज्जत से सवाल करती थी, सबरी की बातें उसको जैसे मृगी को मनज़र करती हैं। उसका मन इधर उधर घूम रहा था, जैसे जंगल में औरत खेलते हुए जाल बिछाती है। तुम पूछो मैं बताऊँगा, घर तोड़ने वाला नाम कमा लिया है। उसने भरोसा बनाया, फिर अयोध्या की औरत बोली। प्यारी सीता, राम कहाँ है रानी? तुम राम को प्यारी हो, यह सच है। जो दिन बीत गए वो गए, वक्त बदल रहा है, दुश्मन दोस्त बन रहे हैं। सूर्यवंश को पानी के बिना जला के राख कर देता है। तुम्हारी सौतन जल कर तुम्हे बर्बाद करना चाहती है, कुछ उपाय करो।
Verse 36 (दोहा/सोरठा)
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।
रानी, तुम चिंता मत करो। तुम्हारा भाग्य तुम्हारे हाथ में है। तुम्हारा दिल भारी है, पर तुम्हारा मुँह मीठा है। राजा का स्वभाव सीधा और अच्छा है।
Verse 37 (चौपाई)
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।। पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।। सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।। सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।। राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।। रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।। यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।। आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।
राम की माता समझदार और गहरी सोच वाली थी। उसने मौका देख के अपनी बात ऐसे समझाया। भरत अपने मामा के घर राजा बन के गया है। राम, इसमे मेरी माता की सलाह मत समझना। सौतेली माएँ मुझसे अच्छी तरह सेवा करती हैं। भरत की माता अपने बेटे पे गर्व में भरी हुई है। कैकेयी, तुम्हारी जेठानी, धोखेबाज़ या चालक नहीं है। राजा तुमपे खास प्यार रखता है। वो सौतेली मा की असलियत नहीं देख पाता। उसने राजा के लिए जाल बिछाया है। उसका मन राम के राजतिलक में लगा है। इस कुल में तिलक राम का हक़ है। यह सबको सूट करता है, मुझे बहुत अच्छा लगता है। आगे की बात समझ के मुझे डर लगने लगा। जो लिखा है, वही होगा।
Verse 38 (दोहा/सोरठा)
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।
उसने लाखों चालें सोच के बनाई। उसने धोखे का खेल शुरू किया। वो सौतेली माओं की कहानी ऐसे सुनाएगी कि लड़ाई और बढ़ जाएगी।
Verse 39 (चौपाई)
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।। का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।। भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।। खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।। जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।। रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।। रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।। जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।
रानी के बनाए हुए फीलिंग्स से उसके दिल में भरोसा आ गया। रानी ने दोबारा पूछा और कसम खिलाई। और क्या पूछूँ? क्या तुम मुझे अब तक नहीं जानते? मैं जानता हूँ कौन दोस्त है कौन दुश्मन। आज दिन है जब सब लोग इकट्ठे हो रहे हैं। आज मैंने तुम्हे याद किया। जो राज्य तुम्हारा हक़ है, वो खाओ और पहनो। मैं सच बोल रहा हूँ, मुझमे कोई दोष नहीं। अगर मैं झूठ बोलूँगा, तो ब्रह्मा मुझे सज़ा देगा। कल अगर राम का राजतिलक होगा, तो तुम्हारे लिए बड़ा मुसीबत आएगी। ब्रह्मा की मर्ज़ी से यह होगा। मैं सीधी लकीर खींच के बोल रहा हूँ। हीर रानी, तुम दूध की तरह साफ़ हो, पर मक्खी की तरह काला हो जाओगी। अगर तुम अपने बेटे के साथ नौकरी करोगी, तो घर में रह जाओगी। कोई और उपाय नहीं है।
Verse 40 (दोहा/सोरठा)
कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।
जैसे कद्रू ने विनता को दुख दिया था, वैसे कैकेयी तुम अपने आप को दुख दोगी। भरत अपने मामा के घर में रहेगा। लक्ष्मण और राम तुम्हारे स्वामी होंगे।
परंपरागत मान्यता में अयोध्या काण्ड के इन प्रसंगों का पाठ ‘विवेक-जागरण’ कराता है: मंथरा-कपट और देव-प्रपंच के बीच भी राम-धर्म की स्मृति दृढ़ होती है, गृहस्थ-जीवन में ईर्ष्या/भय से बचने की बुद्धि मिलती है, और ‘प्रसाद-बुद्धि’ (जो हो, राम-इच्छा) का संस्कार बढ़ता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-स्मरण को संपुट रूप में रखा जाता है; कुछ परंपराएँ संकट-निवारण हेतु ‘रामचरितमानस’ के प्रसंग-पाठ के साथ ‘हनुमान चालीसा’/‘राम रक्षा स्तोत्र’ जोड़ती हैं, पर यह स्थानीय आचार पर निर्भर है।
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