Ayodhya KandaPrakarana 1920 Verses

Prakarana 19

यह सोपान ‘धर्म-संकट’ से ‘शरणागति’ की ओर चढ़ने का द्वार है: राज्य-व्यवस्था (राजधर्म) टूटती दिखती है, पर भक्त-हृदय में राम-नाम का राज्य (रामराज्य-तत्त्व) स्थापित होता है। यहाँ वियोग, लोक-लज्जा, और अपजस के बीच ‘राम-पद-संमुखता’ ही मुक्ति-सीढ़ी का अगला पायदान बनती है।

यह प्रकरण ‘राज्य’ और ‘स्वामित्व’ के प्रतीक-युद्ध का है: बाह्य राजसत्ता (नगर, सेना, संपत्ति) को तुलसी ‘परिणाम-धर्म’ के अधीन दिखाते हैं—सब रघुपति का, सेवक का धर्म स्वामी-हित। कैकेयी के आरोप ‘लोक-लज्जा/अपजस’ के प्रतीक हैं—समाज की दृष्टि का भार, जो भक्त-हृदय को तोड़ भी सकता है और शुद्ध भी। भरत का मन-परिवर्तन ‘धर्म-संकट से शरणागति’ का द्वार है: जब बाह्य व्यवस्था डगमगाती है, तब भीतर राम-नाम का राज्य स्थापित होता है। गुह का संशय प्रतीक है कि भक्ति अंध-भावुकता नहीं; उसमें विवेक, सावधानी, और यथार्थ-बोध भी आवश्यक हैं। समग्र संकेत: वियोग की आग में अहंकार गलता है, और वही करुणा शांत होकर ‘राम-पद-संमुखता’ बन जाती है—यही मोक्ष-सीढ़ी का ठोस पायदान।

Verses

चौपाई 180.1-4

कैकेई भव तनु अनुरागे।पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।

जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे।देखब सुनब बहुत अब आगे।।

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा।पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।।

लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू।दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।।

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू।कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।।

एहि तें मोर काह अब नीका।तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।

कैकई जठर जनमि जग माहीं।यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।।

मोरि बात सब बिधिहिं बनाई।प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।

kaikeī bhava tanu anurāge |pā̃vara prāna aghāi abhāge ||

jauṁ priya birahã prāna priya lāge |dekhaba sunaba bahuta aba āge ||

lakhana rāma siya kahũ banu dīnhā |paṭhai amarapura pati hita kīnhā ||

līnha bidhavapana apajasu āpū |dīnheu prajahi soku saṁtāpū ||

mohi dīnha sukhu sujasu surājū |kīnha kaikeīṁ saba kara kājū ||

ehi teṁ mora kāha aba nīkā |tehi para dena kahahu tumha ṭīkā ||

kaikaī jaṭhara janami jaga māhīṁ |yaha mohi kahã kachu anucita nāhīṁ ||

mori bāta saba bidhihiṁ banāī |prajā pā̃ca kata karahu sahāī ||

मेरे बुरे नसीब की जान कैकेई से पैदा हुए इस शरीर से चिपक गई है, और अब इसको काफी हो गया है। अगर अपने प्यारे से बिछड़ के भी जान प्यारी लगी, तो आगे बहुत कुछ देखना और सुनना पड़ेगा। उसने राम, सीता और लक्ष्मन को जंगल दिया। अपने पति को अमर लोक भेज कर उसका भला किया। उसने विधवा होना और बदनामी अपने सिर पे ली, और प्रजा को दुख और तकलीफ दी। मुझे उसने खुशी, अच्छा नाम और राज्य दिया। कैकेई ने सच में सबका काम कर दिया। इस सब में अब मेरे लिए क्या अच्छा है? और इसके ऊपर तुम मुझे राजा का तिलक लेने के लिए कह रहे हो। कैकेई के पेट से इस दुनिया में पैदा होके, मेरे साथ जो भी हो रहा है वो कोई गलत नहीं है। मेरी किस्मत ने मेरी सब बातें पहले से ठीक कर रखी हैं। तो फिर तुम पंच लोग मुझे मदद क्यों दे रहे हो?

दोहा 180

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।⁠180।।

graha grahīta puni bāta basa tehi puni bīchī māra |tehi piāia bārunī kahahu kāha upacāra ||⁠180||

एक आदमी को पहले ही कोई भूत पकड़ ले, फिर हवा की बीमारी आ जाए, और फिर बिच्छू काट ले। अगर ऐसे में उसको शराब पिला दी जाए, तो बताओ, कैसा इलाज है ये?

चौपाई 181.1-4

कैकइ सुअन जोगु जग जोई।चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।

दसरथ तनय राम लघु भाई।दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।।

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका।राय रजायसु सब कहँ नीका।।

उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही।कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।

मोहि कुमातु समेत बिहाई।कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।।

मो बिनु को सचराचर माहीं।जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू।अदिनु मोर नहि दूषन काहू।।

संसय सील प्रेम बस अहहू।सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।

kaikai suana jogu jaga joī |catura biraṁci dīnha mohi soī ||

dasaratha tanaya rāma laghu bhāī |dīnhi mohi bidhi bādi baṛāī ||

tumha saba kahahu kaṛhāvana ṭīkā |rāya rajāyasu saba kahã nīkā ||

utaru deũ kehi bidhi kehi kehī |kahahu sukhena jathā ruci jehī ||

mohi kumātu sameta bihāī |kahahu kahihi ke kīnha bhalāī ||

mo binu ko sacarācara māhīṁ |jehi siya rāmu prānapriya nāhīṁ ||

parama hāni saba kahã baṛa lāhū |adinu mora nahi dūṣana kāhū ||

saṁsaya sīla prema basa ahahū |sabui ucita saba jo kachu kahahū ||

जग में कैकेयी के बेटे को जैसी किस्मत बनती है, चतुर ब्रह्मा ने मुझे वही दी है। दशरथ का बेटा और राम का छोटा भाई होना, ये बड़ी बड़ाई भी विधाता ने मुझे बेकार में दे दी। तुम सब कहते हो मुझे राज तिलक लगाओ, और राजा का हुकुम सब को अच्छा लगता है। मैं कैसे जवाब दूं, और किसे को दूं? तुम सब अपनी मर्जी से खुल के बोलो। मुझे और मेरी बुरे दिमाग वाली मां को छोडो, बताओ कौन कहेगा कि किसी ने अच्छा काम किया? मेरे सिवा सारी दुनिया में कौन है जिसे सीता और राम जान से प्यारे नहीं? सब के लिए सबसे बड़ा नुकसान मेरे लिए बड़ा फायदा है। ये मेरी अपनी किस्मत खराब है, किसी और की गलती नहीं। तुम संदेह, अदब और प्यार की वजह से बोल रहे हो। तुम जो भी कहते हो सब ठीक है।

दोहा 181

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।⁠181।।

rāma mātu suṭhi saralacita mo para premu biseṣi |kahai subhāya saneha basa mori dīnatā dekhi ||⁠181||

राम की माँ का दिल बहुत साफ है, और उनका मुझ पर प्यार खास है। प्यार में आकर, मेरी हालत देखकर, वो अपने स्वभाव से बोल रही हैं।

चौपाई 182.1-4

गुर बिबेक सागर जगु जाना।जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।

मो कहँ तिलक साज सज सोऊ।भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।।

परिहरि रामु सीय जग माहीं।कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।।

सो मैं सुनब सहब सुखु मानी।अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।।

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू।परलोकहु कर नाहिन सोचू।।

एकइ उर बस दुसह दवारी।मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।।

जीवन लाहु लखन भल पावा।सबु तजि राम चरन मनु लावा।।

मोर जनम रघुबर बन लागी।झूठ काह पछिताउँ अभागी।।

gura bibeka sāgara jagu jānā |jinhahi bisva kara badara samānā ||

mo kahã tilaka sāja saja soū |bhaẽ bidhi bimukha bimukha sabu koū ||

parihari rāmu sīya jaga māhīṁ |kou na kahihi mora mata nāhīṁ ||

so maiṁ sunaba sahaba sukhu mānī |aṁtahũ kīca tahā̃ jahã pānī ||

ḍaru na mohi jaga kahihi ki pocū |paralokahu kara nāhina socū ||

ekai ura basa dusaha davārī |mohi lagi bhe siya rāmu dukhārī ||

jīvana lāhu lakhana bhala pāvā |sabu taji rāma carana manu lāvā ||

mora janama raghubara bana lāgī |jhūṭha kāha pachitāũ abhāgī ||

दुनिया मेरे गुरु को ग्यान का समंदर मानती है। उनके लिए पूरा जहान हाथ की एक बेर जैसा है। उन्होंने भी मेरे राज तिलक की तैयारी कर दी थी। जब भाग्य मुह मोडता है, सब मुह मोडते हैं। राम और सीता को छोड के, दुनिया में कोई ऐसा नही जो न कहे कि ये मेरा खुद का प्लान था। मैं सब सुनुंगा और सहुंगा, और खुशी मानुंगा। आखिर में पानी जहान होता है, वहान कीचर भी होता है। मुझे डर नही कि दुनिया मुझे बुरा कहेगी। परलोक की चिंता भी मुझे नही है। मेरे दिल में सिर्फ एक जंगल की आग है जो नही सही जाती। कि मुझसे सीता और राम दुखी हो गए। लखन ने जीवन का असली लाभ पा लिया। उसने सब छोड दिया और अपना मन राम के चरणों में लगा दिया। मेरा जनम राम के वनवास के लिए हुआ है। मैं अभागी हूं, क्यों बेकार पछताता हूं।

दोहा 182

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।⁠182।।

āpani dāruna dīnatā kahaũ sabahi siru nāi |dekheṁ binu raghunātha pada jiya kai jarani na jāi ||⁠182||

मैं सबके आगे सिर झुका कर अपनी बहुत बड़ी मजबूरी बताता हूँ। राम के चरण देखे बिना मेरे दिल का जलन खत्म नहीं होगा।

चौपाई 183.1-4

आन उपाउ मोहि नहि सूझा।को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।

एकहिं आँक इहइ मन माहीं।प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।।

जद्यपि मैं अनभल अपराधी।भै मोहि कारन सकल उपाधी।।

तदपि सरन सनमुख मोहि देखी।छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ।कृपा सनेह सदन रघुराऊ।।

अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा।मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।।

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी।आयसु आसिष देहु सुबानी।।

जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी।आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।

āna upāu mohi nahi sūjhā |ko jiya kai raghubara binu būjhā ||

ekahiṁ ā̃ka ihai mana māhīṁ |prātakāla calihaũ prabhu pāhīṁ ||

jadyapi maiṁ anabhala aparādhī |bhai mohi kārana sakala upādhī ||

tadapi sarana sanamukha mohi dekhī |chami saba karihahiṁ kṛpā biseṣī ||

sīla sakuca suṭhi sarala subhāū |kṛpā saneha sadana raghurāū ||

arihuka anabhala kīnha na rāmā |maiṁ sisu sevaka jadyapi bāmā ||

tumha pai pā̃ca mora bhala mānī |āyasu āsiṣa dehu subānī ||

jehiṁ suni binaya mohi janu jānī |āvahiṁ bahuri rāmu rajadhānī ||

मुझे कोई और रास्ता नहीं सूझता। राम के बिना कौन समझता है दिल की बात? मेरे मन में एक ही बात फिक्स है। सुबह होते ही मैं अपने भगवान के पास चलूंगा। मैं बुरा और गुनेहगार हूं, और सारी परेशानी मेरे वजह से हुई है। फिर भी, जब वो देखेगा मैं शरण लेने आया हूं, तो सब माफ कर देंगे और मुझ पर खास कृपा करेंगे। रघु के राजा नरम और शर्मीले हैं, बिलकुल सीधे स्वभाव के, कृपा और प्यार का घर हैं। राम ने दुश्मन का भी कभी बुरा नहीं किया। मैं उनका बच्चा और सेवक हूं, चाहे कितना भी उलटा हो। तुम सब समझो ये मेरे भलाई के लिए है। मुझे आशीर्वाद दो और जाने दो, प्यार से। ताकि मेरी मिन्नत सुन कर मुझे अपना मान कर, राम वापस अपनी राजधानी आ जाए।

दोहा 183

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।⁠183।।

jadyapi janamu kumātu teṁ maiṁ saṭhu sadā sadosa |āpana jāni na tyāgihahiṁ mohi raghubīra bharosa ||⁠183||

मेरी माँ बुरी थी, इसलिए मैं भी खराब हूँ, हमेशा दोष से भरा रहा. फिर भी मुझे राम पर भरोसा है. वो मुझे अपना मानेंगे और मुझे छोड़ेंगे नहीं.

चौपाई 184.1-4

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे।राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।

लोग बियोग बिषम बिष दागे।मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।

मातु सचिव गुर पुर नर नारी।सकल सनेहँ बिकल भए भारी।।

भरतहि कहहि सराहि सराही।राम प्रेम मूरति तनु आही।।

तात भरत अस काहे न कहहू।प्रान समान राम प्रिय अहहू।।

जो पावँरु अपनी जड़ताई।तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।।

सो सठु कोटिक पुरुष समेता।बसिहि कलप सत नरक निकेता।।

अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई।हरइ गरल दुख दारिद दहई।।

bharata bacana saba kahã priya lāge |rāma saneha sudhā̃ janu pāge ||

loga biyoga biṣama biṣa dāge |maṁtra sabīja sunata janu jāge ||

mātu saciva gura pura nara nārī |sakala sanehã bikala bhae bhārī ||

bharatahi kahahi sarāhi sarāhī |rāma prema mūrati tanu āhī ||

tāta bharata asa kāhe na kahahū |prāna samāna rāma priya ahahū ||

jo pāvãru apanī jaṛatāī |tumhahi sugāi mātu kuṭilāī ||

so saṭhu koṭika puruṣa sametā |basihi kalapa sata naraka niketā ||

ahi agha avaguna nahi mani gahaī |harai garala dukha dārida dahaī ||

भरत की बात सब को अच्छी लगी। ऐसा लगा जैसे उसमे राम के प्यार का रस भर गया हो। लोग राम के बिना तरह तरह के दुख से जले जा रहे थे। भरत की बात सुनते ही सब जैसे ज़िंदा हो गए, जैसे कोई मंत्र पढ़ने से कोई उठ जाए। माँ साहिबायन, मंत्री, गुरु, और शहर के सब आदमी और औरत, सब बहुत प्यार में डूबे हुए थे। सब ने भरत की बहुत तारीफ की। बोले, तेरा तन ही तो राम के प्यार का रूप है। बेटे भरत, तू ऐसी बात क्यों नहीं बोलेगा? राम को तू अपनी जान जितना प्यारा है। जो कोई मूर्ख अपनी बेवकूफी से तुझे तेरी माँ जैसी कमीनी बोलेगा, वो सैठ, अपने खंदान की करोड़ों पीढ़ी के साथ, सौ युगों तक नरक में रहेगा। नागमणि साँप के पाप और खराबी को अपने अंदर नहीं लेती। वो ज़हर खत्म करती है और दुख और गरीबी को जला देती है।

दोहा 184

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।⁠184।।

avasi calia bana rāmu jahã bharata maṁtru bhala kīnha |soka siṁdhu būṛata sabahi tumha avalaṁbanu dīnha ||⁠184||

हमें पक्का बन चलना है जहाँ राम हैं। भरत ने अच्छी सलाह दी है। हम सब दुःख के समुंदर में डूब रहे थे, और आपने हमें सहारा दिया है।

चौपाई 185.1-4

भा सब कें मन मोदु न थोरा।जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।

चलत प्रात लखि निरनउ नीके।भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।।

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई।चले सकल घर बिदा कराई।।

धन्य भरत जीवनु जग माहीं।सीलु सनेहु सराहत जाहीं।।

कहहि परसपर भा बड़ काजू।सकल चलै कर साजहिं साजू।।

जेहि राखहिं रहु घर रखवारी।सो जानइ जनु गरदनि मारी।।

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू।को न चहइ जग जीवन लाहू।।

bhā saba keṁ mana modu na thorā |janu ghana dhuni suni cātaka morā ||

calata prāta lakhi niranau nīke |bharatu prānapriya bhe sabahī ke ||

munihi baṁdi bharatahi siru nāī |cale sakala ghara bidā karāī ||

dhanya bharata jīvanu jaga māhīṁ |sīlu sanehu sarāhata jāhīṁ ||

kahahi parasapara bhā baṛa kājū |sakala calai kara sājahiṁ sājū ||

jehi rākhahiṁ rahu ghara rakhavārī |so jānai janu garadani mārī ||

kou kaha rahana kahia nahiṁ kāhū |ko na cahai jaga jīvana lāhū ||

सबके मन में बहुत खुशी थी, जैसे बादल गरजते सुन के चातक पक्षी और मोर खुश हो जाते हैं। सुबह चलने का फैसला देख के सबको लगा कि ये बहुत अच्छा फैसला है, और भरत सबके जान से भी प्यारे हो गए। रिशी को प्रणाम किया और भरत के आगे सिर झुकाया, फिर सब ने बिदाई ली और अपने घर चले गए। सब कहते जा रहे थे, 'धन्य है भरत का जीवन इस दुनिया में,' और उसके अच्छे स्वभाव और प्यार की तारीफ करते जा रहे थे। आपस में कहने लगे, 'बहुत बड़ा काम आ गया है,' और सब ने सफर की तैयारी शुरू कर दी। जो भी घर की निगरानी के लिए पीछे रख दिया गया, उसको ऐसा लगा जैसे उसकी गरदन काट दी जा रही हो। किसी ने कहा, 'किसी को पीछे रहने के लिए मत कहो। दुनिया में ऐसा कौन है जो जीवन का फल नहीं चाहता?'

दोहा 185

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।⁠185।।

jarau so saṁpati sadana sukhu suhada mātu pitu bhāi |sanamukha hota jo rāma pada karai na sahasa sahāi ||⁠185||

जो दौलत, घर, आराम, दोस्त, माँ, बाप और भाई राम के चरणों की तरफ जाने में हेल्प नहीं करते, उन्हें जल जाना चाहिए।

चौपाई 186.1-4

घर घर साजहिं बाहन नाना।हरषु हृदयँ परभात पयाना।।

भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू।नगरु बाजि गज भवन भँडारू।।

संपति सब रघुपति कै आही।जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।।

तौ परिनाम न मोरि भलाई।पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।।

करइ स्वामि हित सेवकु सोई।दूषन कोटि देइ किन कोई।।

अस बिचारि सुचि सेवक बोले।जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।।

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा।जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।।

करि सबु जतनु राखि रखवारे।राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।

ghara ghara sājahiṁ bāhana nānā |haraṣu hṛdayã parabhāta payānā ||

bharata jāi ghara kīnha bicārū |nagaru bāji gaja bhavana bhãḍārū ||

saṁpati saba raghupati kai āhī |jau binu jatana calauṁ taji tāhī ||

tau parināma na mori bhalāī |pāpa siromani sāĩ dohāī ||

karai svāmi hita sevaku soī |dūṣana koṭi dei kina koī ||

asa bicāri suci sevaka bole |je sapanehũ nija dharama na ḍole ||

kahi sabu maramu dharamu bhala bhāṣā |jo jehi lāyaka so tehiṁ rākhā ||

kari sabu jatanu rākhi rakhavāre |rāma mātu pahiṁ bharatu sidhāre ||

हर घर में गाड़ियां तैयार हो रही थी, सब के दिल में खुशी थी, क्योंकि सुबह जाना था। भरत घर गया और सोचने लगा: शहर, घोड़े, हाथी, महल, और खज़ाने, ये सब दौलत राम की है। अगर मैं इसको छोड़ के बिना किसी इंतज़ाम के चला जाऊं, तो आखिर में मेरे लिए ठीक नहीं होगा। अपने मालिक को धोखा देना सबसे बड़ा पाप है। वहीं सच्चा नौकर है जो अपने मालिक का भला करे, चाहे कोई लाख गालियां दे। ऐसा सोच कर उसने ऐसे नौकरों को बुलाया जो सपने में भी अपने धरम से नहीं हिले। उन सब को अपना पूरा प्लान बताया, धरम की बात अच्छे से समझाई, और हर एक को वहां लगा दिया जहां वो फिट था। सब अरेंजमेंट कर के गार्ड लगा कर, भरत राम की मां के घर निकल गया।

दोहा 186

आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।⁠186।।

ārata jananī jāni saba bharata saneha sujāna |kaheu banāvana pālakīṁ sajana sukhāsana jāna ||⁠186||

भरत समझदार था। उसने जान लिया कि सारी माएँ बहुत दुखी हैं। उसने हुकुम दिया कि पलनकीन बनवा दो, और आरामदेह सवारी तैयार कर लो।

चौपाई 187.1-4

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी।चहत प्रात उर आरत भारी।।

जागत सब निसि भयउ बिहाना।भरत बोलाए सचिव सुजाना।।

कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू।बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।।

बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे।तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।

अरुंधती अरु अगिनि समाऊ।रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।।

बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना।चले सकल तप तेज निधाना।।

नगर लोग सब सजि सजि जाना।चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।।

सिबिका सुभग न जाहिं बखानी।चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।

cakka cakki jimi pura nara nārī |cahata prāta ura ārata bhārī ||

jāgata saba nisi bhayau bihānā |bharata bolāe saciva sujānā ||

kaheu lehu sabu tilaka samājū |banahiṁ deba muni rāmahiṁ rājū ||

begi calahu suni saciva johāre |turata turaga ratha nāga sãvāre ||

aruṁdhatī aru agini samāū |ratha caṛhi cale prathama munirāū ||

bipra bṛṁda caṛhi bāhana nānā |cale sakala tapa teja nidhānā ||

nagara loga saba saji saji jānā |citrakūṭa kahã kīnha payānā ||

sibikā subhaga na jāhiṁ bakhānī |caṛhi caṛhi calata bhaī saba rānī ||

शहर के आदमी और औरत रात भर जग रहे थे, सुबह होने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे, दिल भारी था। रात गुज़र गई और दिन निकल आया। भरत ने अपने समझदार मंत्रियों को बुलाया। उसने कहा, सारे राज तिलक का सामान साथ ले चलो। बन में जाके रिशि राम को राज देंगे। जल्दी चलो। यह सुनके मंत्री ने उसको प्रणाम किया, और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी तैयार कर दिए। रिशियों के सरदार वसिष्ठ सबसे पहले रथ पे बैठ के निकले। साथ में अरुंधती और यज्ञ की आग भी थी। बहुत सारे ब्राह्मण भी अलग अलग सवारी पे बैठ के निकले। ये सब तपस्या और तेज के भंडार थे। शहर के सारे लोग अपनी अपनी सवारी सजाके चित्रकूट के लिए निकल पड़े। रानियों के पालकी कितने सुंदर थे, बता नहीं सकते। सारी रानियां एक के बाद एक पालकी पे बैठ के निकल पड़ी।

दोहा 187

सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।⁠187।।

sauṁpi nagara suci sevakani sādara sakala calāi |sumiri rāma siya carana taba cale bharata dou bhāi ||⁠187||

भरत ने शहर को वफादार नौकरों के हाथ में दे दिया। सबको इज्जत से रास्ता दे दिया। फिर भरत और उसके भाई दोनों निकल पड़े। दोनों राम और सीता के चरणों को याद कर रहे थे।

चौपाई 188.1-4

राम दरस बस सब नर नारी।जनु करि करिनि चले तकि बारी।।

बन सिय रामु समुझि मन माहीं।सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।

देखि सनेहु लोग अनुरागे।उतरि चले हय गय रथ त्यागे।।

जाइ समीप राखि निज डोली।राम मातु मृदु बानी बोली।।

तात चढ़हु रथ बलि महतारी।होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।।

तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू।सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।।

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई।रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।।

तमसा प्रथम दिवस करि बासू।दूसर गोमति तीर निवासू।।

rāma darasa basa saba nara nārī |janu kari karini cale taki bārī ||

bana siya rāmu samujhi mana māhīṁ |sānuja bharata payādehiṁ jāhīṁ ||

dekhi sanehu loga anurāge |utari cale haya gaya ratha tyāge ||

jāi samīpa rākhi nija ḍolī |rāma mātu mṛdu bānī bolī ||

tāta caṛhahu ratha bali mahatārī |hoihi priya parivāru dukhārī ||

tumhareṁ calata calihi sabu logū |sakala soka kṛsa nahiṁ maga jogū ||

sira dhari bacana carana siru nāī |ratha caṛhi calata bhae dou bhāī ||

tamasā prathama divasa kari bāsū |dūsara gomati tīra nivāsū ||

सब आदमी और औरतें, राम को देखने की चाहत में निकल पड़े, जैसे हाथी पानी देख कर उसकी तरफ दौरते हैं। भरत और उनके भाई शत्रुघ्न, मन में समझ कर कि सीता और राम वन में हैं, पैदल चल निकले। उनका प्यार देख कर लोग इमोशनल हो गए। घोड़े, हाथी और रथ छोड़ दिए और पैदल चल पड़े। राम की माँ भरत के पास गईं, अपनी डोली रोक दी, और धीमी आवाज़ में बोली। "बेटा, रथ पर चढ़ जाओ, मैं मिन्नती करती हूँ। वरना तुम्हारा प्यारा परिवार दुखी रहेगा।" "तुम पैदल चलोगे तो सब लोग भी पैदल चलेंगे। और वो सब दुखी और कमज़ोर हैं, रास्ते के लिए ठीक नहीं।" उनकी बात सिर पर रख कर, उनके चरणों में सिर झुका कर, दोनों भाई रथ पर चढ़े और आगे निकले। पहले दिन तमसा नदी के किनारे ठहरे, और दूसरे दिन गोमती नदी के किनारे ठहरे।

दोहा 188

पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।⁠188।।

paya ahāra phala asana eka nisi bhojana eka loga |karata rāma hita nema brata parihari bhūṣana bhoga ||⁠188||

कुछ लोग सिर्फ दूध पीते थे, कुछ सिर्फ फल खाते थे, और कुछ रात में एक बार खाना खाते थे। राम के लिए लोग व्रत और नियम रखते थे। अपने जेवर और सारी सुख चैन छोड़ देते थे।

चौपाई 189.1-4

सई तीर बसि चले बिहाने।सृंगबेरपुर सब निअराने।।

समाचार सब सुने निषादा।हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।।

कारन कवन भरतु बन जाहीं।है कछु कपट भाउ मन माहीं।।

जौं पै जियँ न होति कुटिलाई।तौ कत लीन्ह संग कटकाई।।

जानहिं सानुज रामहि मारी।करउँ अकंटक राजु सुखारी।।

भरत न राजनीति उर आनी।तब कलंकु अब जीवन हानी।।

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा।रामहि समर न जीतनिहारा।।

का आचरजु भरतु अस करहीं।नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।

saī tīra basi cale bihāne |sṛṁgaberapura saba niarāne ||

samācāra saba sune niṣādā |hṛdayã bicāra karai sabiṣādā ||

kārana kavana bharatu bana jāhīṁ |hai kachu kapaṭa bhāu mana māhīṁ ||

jauṁ pai jiyã na hoti kuṭilāī |tau kata līnha saṁga kaṭakāī ||

jānahiṁ sānuja rāmahi mārī |karaũ akaṁṭaka rāju sukhārī ||

bharata na rājanīti ura ānī |taba kalaṁku aba jīvana hānī ||

sakala surāsura jurahiṁ jujhārā |rāmahi samara na jītanihārā ||

kā ācaraju bharatu asa karahīṁ |nahiṁ biṣa beli amia phala pharahīṁ ||

रात वो सई नदी के किनारे पर रुके थे। सुबह होते ही चल पडे, और श्रृंगवेरपुर बिलकुल पास आ गया। निषाद ने सारी खबर सुन ली। उसके दिल में भारी दुख था, और बार बार सोच रहा था। भरत बन क्यों जा रहा है? इसके दिमाग में जरूर कोई धोखा है। अगर उसके दिल में कोई बुरी नियत नहीं होती, तो वो इतनी बडी फौज क्यों साथ ले जाता? वो प्लान है राम और उनके छोटे भाई को मारने का। फिर आराम से राजा बन के, कोई भी रोके तो नहीं। भरत को राजनीति का कोई आइडिया नहीं है। पहले तो बदनामी थी, अब जान भी जायेगी। सारे देवता और दानव, जितने भी योद्धा हैं, सब मिलकर आये तो भी राम को लडाई में हरा नहीं सकते। भरत का ऐसा करना कोई बडी बात नहीं। जहर की बेल में मीठा फल कहां से आता है?

दोहा 189

अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।⁠189।।

asa bicāri guhã gyāti sana kaheu sajaga saba hohu |hathavā̃sahu borahu tarani kījia ghāṭārohu ||⁠189||

सोच के गुह ने अपने रिश्तेदारो से कहा, सब होशियार रहना। नाव को जकड़ कर डुबा दो, और घाट पर आने का रास्ता बंद कर दो।

Frequently Asked Questions

परंपरा में मान्यता है कि भरत-चरित्र (दीनता, स्वामी-हित, राम-पद-संमुखता) का पाठ ‘भ्रांति-निवारण’ और ‘शरणागति-स्थैर्य’ देता है—मन का संशय (गुह-जैसा) शांत होकर राम-भक्ति में निश्चय बनता है, तथा परिवार/समाज के कलह में भी धर्म-बुद्धि जागती है।

सामान्य मानस-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का नाम-संपुट, तथा विनय-प्रधान प्रसंगों में ‘सियाराम मय सब जग जानी’/‘राम नाम’ का जप-संपुट जोड़ा जाता है (स्थानीय परंपरा के अनुसार)।

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