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वन-प्रवेश ‘त्याग’ का नहीं, ‘आश्रय-परिवर्तन’ का सोपान है: राजधर्म की बाह्य व्यवस्था से हटकर साधक का चित्त अब ‘अन्तर-वन’ (विवेक, वैराग्य, भय, करुणा) में प्रवेश करता है। यहाँ राम-नाम/राम-रूप शरणागति का प्रत्यक्ष साधन बनता है—जहाँ द्रोह (जयंत-काक) भी कृपा से शुद्ध होकर भक्ति की सीढ़ी बन जाता है।
यह प्रकरण ‘वन’ को बाह्य भूगोल नहीं, ‘अन्तर-वन’ (विवेक, वैराग्य, भय, करुणा) के रूप में स्थापित करता है। वन्दना के बिम्ब—विवेक-जलधि, वैराग्य-अम्बुज-भास्कर, मोह-मेघ-विदारण—चित्त-शुद्धि की त्रयी रचते हैं: (1) विवेक = सत्य-असत्य का समुद्र-सा विस्तार, (2) वैराग्य = आसक्ति-तम का सूर्य-भेदन, (3) मोह = मेघ, जिसका विदारण साधना का आकाश खोलता है। जयंत-काक प्रसंग में ‘अपराध → भय → सर्वत्र अनाश्रय → राम-पद-शरण’ की प्रतीक-श्रृंखला बनती है: संसार/लोक-आश्रय सीमित हैं, पर राम-आश्रय असीम। दण्ड ‘धर्म’ का बाह्य रूप है, कृपा ‘धर्म’ का अन्तःसार—यही तुलसी की अनुग्रह-थियोलॉजी है।
Verse 31 (चौपाई)
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।। बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।। लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।। नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।। हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।। तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।। संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।। सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।। राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।। देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।
राम चले गए उस जंगल में जो उन्होंने त्याग दिया था। दोनों भाई, अतुलित बल वाले, नर और केसर जैसे तेज़। प्रभु विरह की तरह दुख करते थे और कई कथाएँ सुनाते थे। लक्ष्मण, देखो इस जंगल की शोभा। देख के भी मन को खुशी नहीं आती। पक्षी और मृग झुंड अपनी नारियों के साथ हैं। मानो वो मुझे निंदा कर रहे हों। मुझे देख के मृग भाग जाते हैं। नारायण कहे, तुम्हे डर नहीं लगता? तुम मृग हो, सुख करो। कांचन मृग ढूँढ़ने आए हो। नारायण को साथ ले जाते हैं, मानो मुझे सिखाते हैं। बार-बार शास्त्र देखता हूँ, राजा को वहाँ रहना नहीं चाहिए जहाँ इज्जत न हो। नारि को दिल में रखना ठीक है, पर राजा के घर में युवा नारि रहना नहीं चाहिए। देखो पिताजी, बसंत कितना अच्छा है। पर मुझे प्रिय से बिछड़ के डर लगता है।
Verse 32 (दोहा/सोरठा)
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।। देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात। डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।
मैं बिरह के कारण बहुत कमज़ोर हो गई हूँ। मुझे अकेला समझो, बिल्कुल अकेला। जंगल के पक्षी और मधुमक्खी भी प्यार के लिए मदद कर रहे हैं। जब मैंने देखा कि वो अपने भाई के साथ चला गया, और उसके दोस्त की बात सुनी, मेरा दिल वहीं रुक गया। मेरे दिमाग की पूरी सेना वहीं खड़ी हो गई।
Verse 33 (चौपाई)
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।। कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।। बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।। कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।। कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।। मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।। तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।। रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।। मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।। चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।। लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।। एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।
बड़े पेड़ों पर बेलें चढ़ी हुई हैं। उनकी छाँव ऐसे फैली है जैसे किसी ने जान बूझ के तान दी हो। केला और ताड़ के पेड़ झंडे जैसे लग रहे हैं। पर जो दिल में पक्का है, वो इन सब से घबराता नहीं। हर तरह के पेड़ फूल रहे हैं, जैसे प्यार ने हर तरह के हार बना दिए हैं। यहाँ-वहाँ सुंदर पेड़ खड़े हैं, जैसे योद्धा अपनी छाँव डाल रहे हैं। कोयल गा रही है जैसे हाथी चिंक रहा हो। ढोल और शंख की आवाज़ गूँज रही है। मोर, चकोर, तोता और बाज़ सब नए-नए लग रहे हैं। कबूतर और हंस भी तैयार हैं। टिटरी और दूसरे पक्षी झुंड में उड़ रहे हैं। प्यार की सेना का कोई हिसाब नहीं। रथ, पहाड़, पत्थर, ढोल और झरना सब आवाज़ कर रहे हैं। मधुमक्खी ढोल और बीन बजाए जा रही हैं। हवा भी आ गई है। चारों तरफ की सेना आ गई है। सब एक दूसरे को चैलेंज दे रहे हैं। लक्ष्मण प्यार की सेना को देख रहा है। पर वो लोग अपने धरम पर चले जा रहे हैं। सिर्फ एक औरत में इतनी ताकत है। इसलिए वो बड़ा योद्धा बच गया।
Verse 34 (दोहा/सोरठा)
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।। लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि। क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।
पिता जी, तीन बड़े दुश्मन हैं। काम, क्रोध और लोभ। यह तीनों बहुत ताकतवर हैं। एक पल में रिशि के ज्ञान को हिला देते हैं। लोभ का मतलब है दिखावा करना। काम की ताकत सिर्फ औरत में है। क्रोध की ताकत कठिन बातों में है। बड़े रिशि यही सोच के कहते हैं।
Verse 35 (चौपाई)
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।। कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।। क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।। सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।। उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।। पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।। संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।। जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।
राम भगवान सब से बड़े हैं। वो सब गुणों से परे हैं। वो सब जगह काम करते हैं। जो लोग काम में फंसे हैं, उन्हे राम नीचा दिखाता है। जो लोग पक्के हैं, उनका दिल राम की तरफ जाता है। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और माया सब राम की कृपा से छुट जाते हैं। जिस पर राम दया करता है, वो माया में नहीं फंसता। उमा, मैं अपना अनुभव बताता हूँ। हरि भक्ति सच है, यह दुनिया सपना है। फिर प्रभु एक तालाब के किनारे गए। उसका नाम पंपा था। वो बहुत सुंदर और गहरा था। जैसे संतों का दिल साफ होता है, वैसा ही वो ताल था। वहाँ सुंदर घाट बनाए थे। हर तरफ मृग पानी पी रहे थे। जैसे कोई बड़ा आदमी मेहमान को खाना खिलाता है।
Verse 36 (दोहा/सोरठा)
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म। मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।। सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं। जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।
कमल के पेड़ पानी में सब की छाँव करते हैं। उनकी जड़ आसानी से नहीं मिलती। वो माया से ढाकी हुई है, दिखाई नहीं देती। जैसे निर्गुण ब्रह्म दिखाई नहीं देता। मछलियाँ खुश हैं, पानी में डूबी हुई। पानी बहुत गहरा है। जैसे धरम वाले लोगों के दिन खुश गुज़रते हैं।
Verse 37 (चौपाई)
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।। बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।। चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।। सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।। ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।। चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।। नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।। सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।। कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।
कमल के फूल खिल गए थे, कितने रंग के थे। मधुमक्खियाँ वहाँ गूँज रही थी, मीठी आवाज़ में। पानी के पक्षी और हंस बोल रहे थे, जैसे राम जी को देख के तारीफ कर रहे हो। चक्रवाक, बगुले और उड़ने वाले पक्षी, इतने सारे थे कि बता नहीं सकते। सुंदर पक्षी जिनकी आवाज़ अच्छी थी, रास्ते जाते लोगों को बुला रहे थे जैसे। ताल के पास रिशियों के घर थे। चारों तरफ जंगल के पेड़ थे, कितने अच्छे लग रहे थे। चंपक, बकुल, कदम्ब और तमाल के पेड़ थे। पाटल, जैकफ्रूट और आम के पेड़ भी थे। नए पत्ते और फूलों से पेड़ भरे हुए थे। मधुमक्खियाँ गा रही थी। ठंडी हवा चल रही थी, अच्छी खुशबू आ रही थी, मन को अच्छा लगता था। कोयल कुहू-कुहू करती थी। रिशि लोग ध्यान में बैठे थे, उनकी आवाज़ सुन के ध्यान टूट गया।
Verse 38 (दोहा/सोरठा)
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।
सारे पेड़ फलों से भरे हुए थे, इतने कि झुक के ज़मीन तक आ गए थे। जैसे कोई अच्छा इंसान जब उसको कुछ मिलता है, वो झुकता है न, वैसे ही पेड़ झुके हुए थे।
Verse 39 (चौपाई)
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।। देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।। तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।। बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।। बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।। मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।। ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।। यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।। गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।। करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।। स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।
राम जी ने वो सुंदर ताल देखा। उसमें नहा के उनको बहुत सुकून मिला। पेड़ों की अच्छी छाँह थी, वहाँ राम जी भाई के साथ बैठे। वहाँ सब देवी-देवता और रिशि आए। उन्होंने राम जी की तारीफ की और अपने घर चले गए। राम जी वहाँ खुश बैठे थे। भाई को कहानी सुना रहे थे, कितनी अच्छी लग रही थी। नारद जी ने देखा कि राम जी अलग हैं। उनका मन चिंता में पड़ गया। राम जी मेरा श्राप मान के बहुत दुख सहते हैं। मैं जाके ऐसे भगवान को देखूँ, ऐसा मौका दोबारा नहीं आएगा। यह सोच के नारद जी अपना वीणा लिए वहाँ गए जहाँ राम जी बैठे थे। राम जी की कहानी गा के सुना रहे थे, प्यार से। राम जी ने उनको प्रणाम किया, उठाया और बहुत बार गले लगाया। स्वागत करके पास बिठाया। लक्ष्मण ने उनके पैर धोए।
Verse 40 (दोहा/सोरठा)
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
नारद जी ने बहुत तरह से विनती की। जब उनको लगा राम जी खुश हैं, तब हाथ जोड़ के बोले।
परम्परागत मान्यता अनुसार जयंत-काक शरणागति, अत्रि-स्तुति, और सरभंग-मोक्ष प्रसंग का पाठ ‘कलिमल-समन’ है: अपराध-बोध से शुद्धि, भय से निवृत्ति, और राम-पद में अनन्य भरोसा दृढ़ होता है; साधक के भीतर वैराग्य-विवेक जाग्रत होकर दया/क्षमा का संस्कार बनता है।
सामान्य सत्संग-परम्परा में शरणागति-स्थलों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-संकीर्तन का सम्पुट जोड़ा जाता है; अत्रि-स्तुति/वन्दना के साथ ‘ॐ श्रीरामाय नमः’ (राम-तारक मन्त्र) का जप भी प्रचलित है।
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